शिवचरण मुंडेपी ऐसे व्यक्ति हैं जिनमें निश्च्छल पहाड़ को देखा जा सकता है। राजधानी दिल्ली में पहाड़ के सरोकारों के बारे में इतने सजग लोग कम ही मिलते हैं। हैं भी तो उनके अपने एजेंडे हैं। मुंडेपी जी का जब भी फोन आता है समझो पहाड़ के बारे में कोई बात होगी। वह बात गोष्ठी की हो सकती है, किसी कार्यक्रम की जानकारी के लिये हो सकता है, कोई अच्छी खबर हो सकती है, कभी पहाड़ में कुछ नहीं हो रहा है इसकी पीड़ा हो सकती है, कभी पहाड़ के दुख-दर्द भी हो सकते हैं। इस बार उनका फोन एक दुखद समाचार सुनाने के लिये आया। इस समाचार में अपने बीच के ऐसे व्यक्ति को खोने की सूचना थी जिसने अपना पूरा जीवन गढ़वाली भाषा और साहित्य को समर्पित कर दिया। नत्थीलाल सुयाल के निधन की खबर उत्तराखंड के भाषा, साहित्य और सामाजिक सरेकारों से जुड़े लोगों के लिये बड़ा आघात है। हम सब लोग उन्हें एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जानते हैं जो घोर असहमति के बाद भी लोकतांत्रिक तरीके से बातचीत का रास्ता तैयार करता है। एक ऐसा व्यक्ति जो आपको बेहद रूढ लेकिन संवेदनशील लगता हो। एक ऐसा व्यक्ति जिससे आप खूब लड़ सकते हैं और हमेशा लड़ते रहना चाह सकते हैं। ऐसा व्यक्ति जो रचनात्मकता का ऐसा फलक तैयार करता हो जहां गंभीरता है, जहां आगे चलने का रास्ता है, जहां संशोधन कर सकने की गुजाइश हो। इससे भी बढ़कर जहां हर अच्छी बात को आत्मसात करने का स्पेस हो। ऐसे नत्थीलाल सुयाल के जाने से उत्तराखंड की उस पंरपरा को नुकसान हुआ है जो सिर्फ और सिर्फ सरोकारों के लिये जीते हैं।
स्व. सुयालजी से पहला मिलना ही असहमति जैसा था। उन दिनों मैं शैल स्वर के नाम से एक अखबार निकालता था। उसके पहले अंक को उन्होंने कहीं देखा। मेरे पास उन दिनों फोन नहीं था इसलिये संपर्क नहीं कर पाये। एक दिन वे शकरपुर कार्यालय में स्वयं ही आ गये। कई शिकायतों और गलतियों बताने के बाद उन्होंने कहा कि मैं यह नहीं समझ पा रहा हूं कि इतना गंभीर अखबार निकालने वाला संपादक अपने नाम की वर्तनी ही गलत लिख रहा है। पता नहीं कैसे और क्यों लगातार मेरे नाम की वर्तनी गलत जा रही थी। कभी किसी ने बताया नहीं। वे अखबार ले गये और कहा कि अभी तो सरसरी तौर पर देखा है बांकी देखने के बाद बताउंगा। एक सप्ताह के बाद उन्होंने जब मुझे अखबार पकड़ाया तो पूरा का पूरा अखबार लाल किया था। उन्होंने उन तमाम शब्दों को मार्क कर दिया जिन्हें हम पत्रकारिता में स्वीकार कर चुके हैं। जैसे अन्तरराष्टीय, चरचा, खरचा, परचा आदि। मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि जो व्यक्ति मेरी गलतियां ही बताने आया हो वह अखबार को आगे बढ़ाने के लिये भी उतना गंभीर कैसे हो सकता है। उन्होंने पहली ही बार में पांच सदस्यों की लिस्ट मुझे पकड़ा दी। उसके बाद कई लोंगों को मिलाते रहे। पहली बार पता चला कि गढ़वाली साहित्य के लिये बहुत सारे लोग गंभीरता से काम कर रहे हैं। उन्होंने उन दिनों गढ़वाली साहित्य के प्रतिष्ठित कवि कन्हैयालाल डंडरियाल की कविताओं का संकलन ‘अंज्वाल’ प्रकाशित किया था। वे उनकी रचनाओं पर आगे भी काम कर रहे थे। स्व. सुयाल के पास रचनात्मकता की एक विशेष दृष्टि थी। उन्होंने गढ़वाली भाषा और साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिये व्यक्तिगत तौर पर प्रयास किये। उनकी चिन्ता इस बात की थी कि गढ़वाली साहित्य को उस तरह से नहीं लिया गया जिसका वह हकदार है। बाजार में सीडी और फिल्मों कें माध्यम से आयी साहित्यिक विकृतियों से वे हमेशा आहत थे। लंबे समय से वे बीमार चल रहे थे। उन्होंने पिछले दिनों एक कलेण्डर प्रकाशित किया जिसमें उनकी रचनात्मकता का पता चलता है। लंबे समय तक हम लोग साथ कुछ न कुछ काम करते रहे। हम सामाजिक क्षेत्र में थे तो वे साहित्य में, लेकिन बाद में पहाड़ के सवालों को समझने के लिये एक बड़ा मंच तैयार होने लगा था। उन्होंने कुछ लोगों से मिलाया जो गढ़वाल साहित्य पर विशेष काम कर रहे हैं। उनमें नेत्र सिंह असवाल, जयपाल रावत ‘छिपडुदादा’, गजेन्द्र रावत, ललित मोहन केशवान जी से मिलवाया। स्व. सुयाल को गढ़वाली साहित्य में उनके योगदान के लिये हमेशा याद किया जायेगा।
इस बीच सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी खीम सिंह नेगी जी का निधन हुआ। वह 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के मुख्य आंदोलनकारियों में रहे। अल्मोड़ा जनपद के कफड़ा क्षेत्र के रहने वाले नेगी 1939 में विमलानगर सम्मेलन के बाद उभरी नई युवा पीढ़ी के प्रतिनिधि थे। आजादी के बाद वे लगातार क्षेत्रीय समस्याओं के प्रति अपनी चिंता व्यक्त करते रहे। राज्य आंदोलन के दौर में हम लोग उनसे मिलते थे। उनका एक वाक्य होता था कि दूसरी आजादी चाहिये। उन्हें लगता था कि जिस तरह उनकी पीढ़ी न अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन कर व्यवस्था परिवर्तन का रास्ता निकाला, नई पीढ़ी को भी बेहतर भारत बनाने के लिये संघर्ष करना चाहिये। शायद यही कारण था कि वे आजादी के बाद कांग्रेस में उस तरह से सक्रिय नहीं हुये जिस तरह से आजादी के बाद कई स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वोट की राजनीति में शामिल हुये। उन्होंने बाद में भी सामाजिक एवं राजनीतिक रूप से किसी भी र्सााक बदलाव का साथ दिया। हमारी पीढ़ी ने उनसे हमेशा जनसरोकारों के लिये आगे बढ़ने की सीख ली। 23 अप्रेल को 1930 भारत के इतिहास के लिये महत्वपूर्ण है। इस दिन पेशावर में वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली के नेतृत्व में गढ़वाली सैनिकों ने निहत्थे पठानों पर गोली चलाने से इंकार कर दिया था। अंग्रेजों के फरमान के खिलाफ सीज फायर का आदेश देने वाले चन्द्र सिंह गढ़वाली ने सबसे पहले देश में हिन्दू-मुस्लिम एकता की मिसाल कायम की। गढ़वाली जी को आजाद भारत में कभी भी इस तरह याद नहीं किया गया जिस तरह का बलिदान उन्होंने दिया। आजाद भारत में भी उन्हें जेल मिली। उन्होंने अंतिम समय तक जनहित के मुद्दों पर अपनी लड़ाई जारी रखी। चन्द्र सिंह गढ़वाली ही थे जो दूधाताली तक रेल का सपना देख सकते थे। यह सपना सिर्फ रेल ले जाने का नहीं, बल्कि सुदूद क्षेत्रों में विकास की अभिव्यक्ति भी थी। ताउम्र अभाओं में रहे गढ़वाली के परिजन आज भी उपेक्षित हैं। गढ़वाली को याद करते हुये उन सरोकारों को आगे बढ़ाना जरूरी है जिनके लिये खीम सिंह नेगी और नत्थीलाल सुयाल जैसे लोग चिन्तित रहे हैं। दुर्भाग्य से उत्तराखण्ड के नीति-नियंताओं का अपने लोगों को याद करने का चश्मा अलग है। उनके योगदान को समझने की उन्होंने कभी कोशिश भी नहीं की। यही कारण है कि जब भी गढ़वाल में कोई साहित्यिक योगदान की बात आती है तो उसमें जुयाल नहीं किसी और को या किया जाता रहा है। पिछले पांच वर्षों में कई ऐसे लोगों को पद्मश्री पुरस्कार मिले हैं जिन्हें लोगों ने तब जाना जब उन्हें भारत सरकार ने पुरस्कार से नवाजा। कई एनजीओ वालों को पुरस्कार मिलता है तब पता चलता है कि उन्होंने पहाड़ के लिये बहुत काम किया है। इसलिये विभिन्न क्षेत्रों में बिना किसी स्वार्थ के काम करने वाले लोगों को याद कर सरोकारों को आगे बढ़ाने समझ बननी चाहिये।
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