राजधानी दिल्ली में पहाड़ के युवा पत्रकारों की एक बड़ी जमात है, जो लंबे समय से उत्तराखण्ड के तमाम सवालों को लेकर सक्रिय रहे हैं। हालांकि पहाड़ के पत्रकारों की यहां एक संस्था उत्तराखण्ड पत्रकार परिषद के नाम से पिछले ढाई दशक से अस्तित्व में है। यह बड़े पत्रकारों का संगठन है, इसलिये चाहकर भी नये लोग इसमें शामिल नहीं हो पाते हैं। ये पत्रकार पहाड़ के अन्य संगठनों के साथ मिलकर काम करते रहे हैं। वे चाहते थे कि एक नया संगठन बनाकर पहाड़ के जनसरोकारों की धारा को पत्रकारिता के मंच से आगे बढ़ाया जाये। एक पूरा ब्लूप्रिंट बनाकर यह तय किया गया कि इसी वर्ष पहाड़ की पत्रकारिता के पुरोधा स्वर्गीय भैरवदत्त धूलिया और आचार्य गोपेश्वर कोठियाल के पोस्टर और आजादी से पहले और बाद की पहाड़ की पत्रकारिता की यात्रा पर एक स्मारिका निकाली जायेगी। इस पर काम भी शुरू हो गया। इस बीच सभी ने सोचा कि पुरानी संस्था उत्तराखण्ड पत्रकार परिषद में शामिल होकर ही इसे व्यापक रूप दिया जाये। उत्साह के साथ भारी संख्या में आवेदन भरकर एक जगह इकट्ठा भी कर दिये गये, लेकिन निराशा ही हाथ लगी। जब तक ये युवा एक अच्छी मंशा के साथ इस संगठन से जुड़ते, उसका असली चेहरा सामने आ गया। बाद में पता चला कि किसी भोले महाराज और मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक के सहारे वे अपनी दुकान को सजाने-संवारने में लगे हैं। यह तो अच्छा हुआ कि बेहतर उत्तराखण्ड का सपना देखने वाले इन युवाओं को इनकी असलियत पता चल गयी, नहीं तो पत्रकारिता और अपने समय में नवचेतना के वाहक रहे हमारे प्रेरणास्त्रोत भी शर्मसार होते।
पिछले दिनों उत्तराखण्ड पत्रकार परिषद की एक जमात ने उत्तराखण्ड राज्य के दस वर्ष पूरे होने पर एक सर्वदलीय सम्मेलन का आयोजन किया। अपनी बुद्धि और विवेक के अनुसार उन्होंने सर्वदलीय विचार का जो खाका खींचा, वह मुख्यमंत्री के लिये मंच प्रदान करने और किसी भोले महाराज से पैसा ऐंठने की जुगत का हिस्सा था। कहने को उन्होंने कांग्रेसी नेता हरीश रावत, उक्रांद नेता काशी सिंह ऐरी, सीपीआई के समर भंडारी और एनसीपी के डीपी त्रिपाठी को भी बुलाया, लेकिन लोगों की समझ में यह बात नहीं आयी कि उत्तराखण्ड के दस वर्षों पर बात करने के लिये उन्हें पहाड़ में और कोई दल और संगठन नहीं दिखायी दिये। उत्तराखण्ड राज्य के लिये संघर्ष और पिछले तीन दशक से वहां की राजनीति में हिस्सेदारी करने वालों को परिषद इस योग्य नहीं मानती कि वे इस विषय पर अपनी राय रख सकें। अगर ऐसा होता तो उत्तराखण्ड लोकवाहिनी, उत्तराखण्ड महिला मंच, उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी, उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा, सीपीएम, उत्तराखण्ड लोकमंच, उत्तराखण्ड महासभा, उत्तराखण्ड जनमोर्चा के अलावा उन आंदोलनकारी संगठनों को बुलाना चाहिये था, जो राज्य के तमाम सवालों को बेहतर तरीके से समझ सकतेप्त हैं। यदि यह सर्वदलीय सम्मेलन ही था तो आयोजकों को यह नहीं भूलना चाहिये कि राज्य की विधानसभा में बसपा के आठ विधायक हैं। वह भाजपा और कांग्रेस के बाद सबसे बड़ी पार्टी है। खैर, यह तो आयोजकों की मर्जी कि वे भोले को सर्वदलीय मानें या उत्तराखण्ड की बाकी शक्तियों को, जैसा कि उन्होंने माना भी। सबसे परेशान करने वाली बात आयोजकों की दादागिरी, मुख्यमंत्री की भाटगिरी और आंदोलनकारी शक्तियों को अराजक तत्व बताने की है। सत्ता का सानिध्य पाने और मंच से पहाड़ के लोगों को निराशावादी और नकारा कहने वाले मुखिया की चरणवंदना कर आंदोलन की एक धारा का अपमान करना गंभीर बात है।
दिल्ली के कांस्टीट्यूशनल क्लब में आयोजित इस सम्मेलन में जब मुख्यमंत्री बोलने लगे तो लोगों ने बहुत देर तक उनकी उन बेसिर-पैर की बातों को झेला जिसे वे पिछले एक साल से हर जगह कहते और प्रचारित करते रहे हैं। कुंभ से लेकर धौनी से हुयी टेलीफोन वार्ता की बातें सुनकर जब लोगों से नहीं रहा गया तो उन्होंने उनसे कुछ सवाल कर दिये। यही सवाल करना मुख्यमंत्री और उनके पोषित पत्रकारों को अच्छा नहीं लगा। जब आयोजकों ने सवाल पूछने वाले लोगों पर दारोगागिरी दिखाना शुरू किया तो माहौल गर्म हो गया। सबसे अलग से सवालों का जवाब देने की बात कहने वाले मुख्यमंत्री को सम्मेलन छोड़कर भागना पड़ा। उनके खिलाफ लोगों ने जमकर नारेबाजी की। आयोजकों ने सवाल करने वालों को अराजक कहा और मुख्यमंत्री ने नकारा। संगोष्ठी में जिन लोगों को अराजक कहा गया, उनमें वे लोग थे जो पिछले दो-तीन दशक से राज्य के तमाम सवालों के लिये आंदोलित रहे हैं। दूसरे दिन समाचार पत्रों में निशंक के गुणगान और अराजक तत्वों के उनके भाषण के दौरान व्यवधान पहुंचाने के समाचार प्रकाशित हुए। बताया जाता है कि उत्तराखण्ड निवास जाकर आयोजक पत्रकारों ने मुख्यमंत्री निशंक से माफी भी मांग ली। अब विभिन्न संचार माध्यमों से यह प्रचारित किया जा रहा है कि एक देवता समान मुख्यमंत्री जो रात-दिन पहाड़ के विकास में लगा है, उसे अराजक तत्व काम नहीं करने दे रहे हैं। गौरतलब है कि पत्रकार परिषद के कई पुराने सदस्यों ने भी इस कार्यक्रम का बहिष्कार किया था। उम्मीद की जानी चाहिये कि उत्तराखण्ड में सबको मैनेज करने की राजनीतिक प्रवृत्ति का विरोध आगे जारी रहेगा। क्योंकि बदलाव करने वाले व्यक्ति और संगठन न तो किसी भोले के पांच लाख रुपये में खरीदे जा सकते हैं और न ही किसी मुख्यमंत्री से मैनेज हो सकते हैं। यकीन मानिये कि स्वर्गीय भैरवदत्त धूलिया, आचार्य गोपेश्वर कोठियाल, बद्रीदत्त पांडे, विक्टर मोहन जोशी और शहीद उमेश डोभाल की परंपरा अभी जिन्दा है।

Tiwari ji,
Namaskar, Aapka lekh pada, aacha laga, keep writing
Regards
Umesh Chandra Pant
9899221158
उत्तराखण्ड की जनपक्षधरता को संबल देने का प्रयास करता एक अदना सा आदमी।
is aadamee ko hamaaraa salaam.
धन्यवाद चारू जी , ये सब मैंने tv पर देखा और कुछ clips record भी की. लेकिन विस्तार पूर्वक आप से ही असलियत का पता चला. .
सादर,
पहले जल- विद्युत, फिर स्टर्डिया ने निशंक की आतंरिक भावनाओ को सबके सामने रख दिया ! बाकी सबकी नजर कोर्ट के फैसले पर टिकी है , मुझे पूरी उम्मीद है की अगर एक दो बड़े नेता या नौकरशाहों को सजा मिल जाये तो हाशिये में पहुच गया आम जन पुन: मुख्यधारा से जुड़ जायेगा।
Charu jee, aap khud ko ADANA sa aadami kah kar apane wajood ko CHHOTA kar rahe hai.n. Aapaka kaam bada hai aur BADA hai to hai…sankoch ke mare BADA nahi kah sakate, to CHHOTA bhi mat kaho. Gr8888 man….