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By चारु तिवारी on June 2, 2010
कुछ माह पहले उत्तराखण्ड क्रान्ति दल का बहुप्रतीक्षित द्विवार्षिक सम्मलेन भारी हंगामे के बाद समाप्त हुआ। नैनीताल जनपद के पीरुमद्वारा के एक बैंक्वट हाल में सत्ता की धमक और कार्यकर्ताओं की उपेक्षा का जो खेल कथित नेतृत्व ने खेला उसे दूर-दराज से आये कार्यकर्ताओं में भारी मायूसी छाई रही। कार्यकर्ताओं की सरकार से समर्थन की [...]
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By चारु तिवारी on June 2, 2010
शिवचरण मुंडेपी ऐसे व्यक्ति हैं जिनमें निश्च्छल पहाड़ को देखा जा सकता है। राजधानी दिल्ली में पहाड़ के सरोकारों के बारे में इतने सजग लोग कम ही मिलते हैं। हैं भी तो उनके अपने एजेंडे हैं। मुंडेपी जी का जब भी फोन आता है समझो पहाड़ के बारे में कोई बात होगी। वह बात गोष्ठी [...]
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By चारु तिवारी on June 2, 2010
आजादी से पहले और बाद में उत्तराखंड में विकास की जितनी भी बातें हुयीं उनमें यहां की प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय लोगों की भागीदारी की मांग महत्वपूर्ण रही है। लंबे समय तक चले जंगलात आंदोलन में भी इस बात पर जोर दिया गया कि जब तक जंगलों पर स्थानीय लोगों के हक-हकूक नहीं होंगे तब [...]
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By चारु तिवारी on June 2, 2010
उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ पिछले दिनों झारखण्ड विधानसभा चुनाव के प्रचार में गये थे। उन्होंने वहां बहुत सारी चुनावी सभाओं और संवाददाता सम्मेलनों को संबोधित किया। अपने कवितामयी भाषणों में उन्होंने लोगों को बताया कि उनकी पार्टी की सरकार ने उत्तराखण्ड को किस तरह विकास के शिखर तक पहुंचाया है। माननीय अटल [...]
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By चारु तिवारी on June 1, 2010
गैरसैंण यात्रा के बाद व्यस्तता के कारण नेट पर सही तरीके से बैठने का समय नहीं मिला। इस बीच जब समय मिला तो कुछ पुरानी मेल देखने को मिली। इनमें गैरसैंण राजधानी को लेकर हमारे कुछ साथियों के विचार अलग थे। स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध और असहमति समाज का मजबूत आधार तैयार करती [...]
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By चारु तिवारी on June 1, 2010
जनकवि दुष्यन्त का यह शेर उत्तराखंड की स्थायी राजधानी आंदोलन के लिये सटीक है- वक्त की रेत पर एड़ियां रगड़ते रहे, मुझे यकीं है कि पानी यहीं से निकलेगा। हमने जब दिल्ली से गैरसैंण के लिये जनजागरण यात्रा पर विचार किया तो मेरे साथियों में उत्साह और गैरसैंण जाकर अपनी बात को कहने का [...]
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By चारु तिवारी on June 1, 2010
उत्तराखण्ड में उत्तरायणी का मेला धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से जितना महत्वपूर्ण है उससे ज्यादा यह नई चेतना और नये संकल्पों के साथ आगे बढने का पड़ाव है। सदियों से इस मेले से कई लोकोक्तियों और लोककथाओं की रचना हुयी। ये इस संदर्भ में ज्यादा महत्वपूर्ण और सार्थक हैं कि सरयू और गोमती के संगम [...]
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By चारु तिवारी on June 1, 2010
उत्तराखण्ड के मौजूदा सवालों को समझने के लिये हम अतीत के कई ऐतिहासिक संदर्भों को को उठाकर उनकी आज की प्रासंगिकता को जोड़कर देख सकते हैं। इस बीच कई ऐसे मौके आये और आने वाले हैं जिनसे संवाद का एक बड़ा फलक तैयार किया जा सकता है। पिछले दिनों उत्तराखण्ड की पत्रकारिता के [...]
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By चारु तिवारी on May 31, 2010
मेरे मोबाइल पर एक मैसेज आया कि उत्तराखण्ड भारत का एक ऐसा राज्य है, जहां के लोग हर दो घंटे में खुशियां मनाते हैं। कैसे…..? लाइट आई ! लाइट आई!! यह हम लोगों भले ही चुटकुला लगे लेकिन यह उतना ही सच है जितना व्यंग्य का मर्म। उर्जा प्रदेश में बिजली मिलने की खुशी ही [...]
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By चारु तिवारी on May 31, 2010
उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन के दौरान जनकवि ‘गिर्दा’ ने एक गीत के माध्यम से राज्य के भावी स्वरूप का खाका खींचा था। उन्होंने इस गीत के माध्यम से सपन्न और आत्मनिर्भर राज्य बनाने की जरूरत पर जोर दिया था। राज्य बनने के लगभग एक दशक बाद इस गीत की प्रासंगिकता अधिक हो गयी है वह इसलिये [...]
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