महापंडित राहुल सांस्कृतायन ने बागेश्वर की अपनी यात्रा का जो वर्णन किया है उससे तत्कालीन बागेश्वर के सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परिवेश को समझने में मदद मिलती है। उनके वर्णन वाले बैजनाथ से लेकर बागेश्वर तक का मार्ग अब उस तरह का नहीं रहा, अब वहां घोड़े से यात्रा नहीं होती। उसकी जगह पर मोटरगाडिय़ां हैं, नये मॉडल की गाडिय़ां वहां दौड़ती हैं। सांस्कृत्यायन के साथ गढ़सेर के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी जयवल्लभ ममगाईं थे। उनके ही गांव के चन्द्रवल्लभ ममगाईं का आजादी की लड़ाई में बड़ा योगदान रहा। जो ममगाईं परिवार उनकी उस यात्रा में उनके साथ रहा, उसकी चौथी पीढ़ी की मनस्वी मॉडलिंग की दुनिया में अपना परचम लहरा रही हैं। उसे पूरी दुनिया उसी रूप में जानती है। इस उपलब्धि के नीचे इस परिवार के सरोकारों के उतने मायने नहीं हैं, जितनी नई पीढ़ी के बाजार बने सरोकारों का। इस परिवार का आजादी के आंदोलन में जो योगदान रहा उसे लोगों ने बहुत देर तक याद भी नहीं किया। यह जरूरत भी बहुत ज्यादा नहीं समझी गयी कि नई पीढ़ी के सहारे ही सही, इस समाज के निर्माण और नये भारत का सपना देखने वाले इस परिवार के योगदान को नये सिरे से समझा और सराहा जाये। कुल मिलाकर हमारी विरासतों को जल्दी विस्मृत कर देने की यह एक मिसाल है, गढ़सेर का ममगाईं परिवार। इस परिवार को अब एक शख्सियत के नाम से जाना जाता है, वह है मनस्वी ममगाईं।
बैजनाथ के पास ही वज्यूला में सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मोहन सिंह मेहता का पैतृक घर है। एक विशाल बंगला, इस बंगले में कभी वज्यूला इंटर कालेज का छात्रावास चलता था, अब यह खण्डहर में तब्दील हो गया है। बड़ी जमीन और खूबसूरत बंगले में आजादी की कई स्मृतियां कैद हैं। मोहन सिंह मेहता का राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन में योगदान रहा और बाद में उत्तर प्रदेश की विधानसभा में जनपक्षीय प्रतिनिधित्व अब किसी को याद नहीं रहा। इसे एक स्मारक के रूप में स्थापित किया जा सकता था, लेकिन हमने इतिहास और संस्कृति से सीखने के रास्ते बंद कर दिये हैं, इसलिये ऐसा हो पायेगा यह संभव नहीं लगता। बागेश्वर के पास चामी गांव है, जो आजादी की लड़ाई का मुख्य केन्द्र रहा। चामी से चरखा आंदोलन और स्वदेशी के जिन स्वरों ने आजादी की अलख जगायी, अब वह गांव भी हमें ज्यादा याद नहीं है। बोरगांव में जीत सिंह टंगडिया ने बागेश्वरी चरखे का निर्माण किया, जिसे गांधीजी ने सराहा। उन्होंने वहीं चरखा आश्रम का निर्माण भी किया। उस दौर में उन्होंने स्वदेशी और स्वरोजगार को जो रास्ता तैयार किया, उसने युवाओं को आजादी के आंदोलन में आने को प्रेरित किया। उन्होंने चरखा भवन भी बनाया। बेरारौ घाटी के अमर सेनानियों की एक समृद्ध परंपरा बागेश्वर से जुड़ी है, जिसने हमारी चेतना का बड़ा फलक तैयार किया। ये कुछ उदाहरण हैं जो बागेश्वर की थाती और उनके सरोकारों का प्रतिनिधित्व करती हैं। पिछले दिनों एक कार्यक्रम में जाने का मौका मिला। इसमें सुप्रसिद्ध कथाकार महेश दर्पण की पुस्तक “पूश्किन के देश में” पर चर्चा हुयी। इसमें देश के जाने-माने साहित्यकार शामिल थे। जब महेश दर्पण जी ने पुस्तक को लिखने की पृष्ठभूमि बतायी तो हम जैसे किसी भी भारतीय को आश्चर्य हो सकता है। उन्होंने बताया कि रूस में जिला और तहसील स्तर पर भी लोगों ने ऐसे संग्रहालय बनाये हैं जो वहां के ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक परिवेश को बताते हैं। ये संग्रहालय इतने भव्य और समृद्ध हैं कि इन्हें सही तरह से देखने और समझने के लिये एक सप्ताह से ज्यादा का समय चाहिये। हम लोगों को यह जानकर भी आश्चर्य हुआ कि रूस के एक कवि पूश्किन पर उनका अलग से संग्रहालय है।
महेश दर्पण ने ठीक ही लिखा पूश्किन के देश में। हम क्या गर्व से किसी साहित्यकार के नाम से कह सकते हैं कि भारत उसका देश है। हम अभी तक प्रेमचन्द जैसे साहित्यकार के लिये भी यह नहीं कह सकते। साहित्यकार तो छोडिय़े, हमें अभी अपने उन तमाम शहीदों की भी याद नहीं जिन्होंने हमारे बेहतर कल के लिये अपना वर्तमान बलिदान किया था। पहाड़ के सन्दर्भ में यह बात और भी लागू होती है, कौसानी में सुमित्रान्दन पंत की स्मृतियों वाले संग्रहालय को भी हम सुरक्षित नहीं रख पाये। बागेश्वर में ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से जिस समृद्ध चेतना की धारा प्रवाहित होती है, उसके संरक्षण की आवश्यकता को समझना समय की मांग है। वह विचार के स्तर पर भी होनी चाहिये और भौतिक स्तर पर भी। बागेश्वर अब धीरे-धीरे एक सरकारी मेले के रूप में तब्दील होता जा रहा है। इस मेले के आयोजन में यहां की विरासत पीछे छूटती जा रही है। हमारे सेनानियों के स्मारक और उनके कामों के संरक्षण की बात तो दूर, लाखों खर्च करने के बाद भी मेला समिति एक स्तरीय स्मारिका तक नहीं प्रकाशित कर पायी है। राहुल सांस्कृयायन से लेकर मनस्वी ममगाईं तक की बागेश्वर की यह यात्रा हमें इस बात की जरूरत को भी समझाती है कि क्या हमें अब अपनी इस विरासत को संजोने के कुछ प्रयास करने चाहिये या यह समझकर, अब सोचना बन्द कर देना चाहिये कि समय के साथ चीजें बदलती हैं। अच्छा होगा कि हम बागेश्वर को अपनी बहुमूल्य थाती के साथ याद करें। मोहन सिंह मेहता, बिश्नी देवी साह, तुलसी रावत, जीत सिंह टंगडिय़ा, श्याम लाल गंगोला, चन्द्रवल्लभ ममगाईं आदि के नाम पर हम जिस दिन बागेश्वर को जानेंगे उस दिन चेतना अपने आप जीवित हो उठेगी।
(विगत कुछ दिनों से नैट पर ब्लाग अपडेट नहीं कर पाया, देरी हेतु क्षमाप्रार्थी हूं- चारु तिवारी)


Bageswar ke bare me apka lekh sarahaniya he, parantu apne 1929 ki gandhi ji ki pedal yatra or kuli utar band karo ka jikra nahi kiya.
Padh kar bahut achchha laga.
bahut hi achhi jaankari hai mere liye mere hi ghar ki ….
priya charu ,
is sarahaniya karya ke iiye kotishash dhanyabad. lekh bahut achchha laga. satat prayas jari rahana chahiye.
shubhechchhu
kedar datt joshi