By चारु तिवारी on April 7, 2011
भारत के क्रिकेट विश्वकप जीतने के बाद देश में राष्ट्रभक्ति का नया उभार आया है। उद्योगपतियों से लेकर मजदूरी करने वाले एक साथ जश्न में शामिल हुये हैं। दुनिया की सबसे मजबूत सुरक्षा व्यवस्था में रहने वाली सोनिया गांधी राजधानी दिल्ली की सडक़ों पर ऐसे उतर आयीं, जैसे वह कोई आम इंसान हों। इसे देखकर [...]
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By चारु तिवारी on June 4, 2010
डेढ दशक बाद उत्तराखंड में फिर आंदोलन के स्वर मुखर होने लगे हैं। आठ साल बाद जनता अपने को ठगा महसूस करने लगी है। स्थायी राजधानी के बहाने यहां हाशिए में धकेले गये सवाल फिर उठाये जा सकते हैं। इसके लिये वे राजनीतिक दल जिम्मेदार हैं जो कभी राज्य के विरोधी रहे और सत्ता में [...]
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By चारु तिवारी on June 4, 2010
चन्द्र नगर गैरसैंण को स्थाई राजधानी बनाने के लिए जनता में एक बार फिर सुगबुगाहट शुरू हो गई है. यह कोई अचानक आई प्रतिक्रिया नहीं है आठ साल, चार मुख्यमंत्री और ग्यारह बार बढाये गये राजधानी चयन आयोग के कार्यकाल के बाद जो फैसला आया है असल में वह यहां की जनता को चिढाने वाला [...]
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By चारु तिवारी on June 2, 2010
आजादी से पहले और बाद में उत्तराखंड में विकास की जितनी भी बातें हुयीं उनमें यहां की प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय लोगों की भागीदारी की मांग महत्वपूर्ण रही है। लंबे समय तक चले जंगलात आंदोलन में भी इस बात पर जोर दिया गया कि जब तक जंगलों पर स्थानीय लोगों के हक-हकूक नहीं होंगे तब [...]
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By चारु तिवारी on June 1, 2010
गैरसैंण यात्रा के बाद व्यस्तता के कारण नेट पर सही तरीके से बैठने का समय नहीं मिला। इस बीच जब समय मिला तो कुछ पुरानी मेल देखने को मिली। इनमें गैरसैंण राजधानी को लेकर हमारे कुछ साथियों के विचार अलग थे। स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध और असहमति समाज का मजबूत आधार तैयार करती [...]
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By चारु तिवारी on June 1, 2010
जनकवि दुष्यन्त का यह शेर उत्तराखंड की स्थायी राजधानी आंदोलन के लिये सटीक है- वक्त की रेत पर एड़ियां रगड़ते रहे, मुझे यकीं है कि पानी यहीं से निकलेगा। हमने जब दिल्ली से गैरसैंण के लिये जनजागरण यात्रा पर विचार किया तो मेरे साथियों में उत्साह और गैरसैंण जाकर अपनी बात को कहने का [...]
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By चारु तिवारी on June 1, 2010
उत्तराखण्ड में उत्तरायणी का मेला धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से जितना महत्वपूर्ण है उससे ज्यादा यह नई चेतना और नये संकल्पों के साथ आगे बढने का पड़ाव है। सदियों से इस मेले से कई लोकोक्तियों और लोककथाओं की रचना हुयी। ये इस संदर्भ में ज्यादा महत्वपूर्ण और सार्थक हैं कि सरयू और गोमती के संगम [...]
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