आजादी से पहले और बाद में उत्तराखंड में विकास की जितनी भी बातें हुयीं उनमें यहां की प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय लोगों की भागीदारी की मांग महत्वपूर्ण रही है। लंबे समय तक चले जंगलात आंदोलन में भी इस बात पर जोर दिया गया कि जब तक जंगलों पर स्थानीय लोगों के हक-हकूक नहीं होंगे तब तक यहां सर्वागीण विकास का रास्ता नहीं निकाला जा सकेगा। जब 1980 में वन अधिनियम के तहत पहाड़ के ग्रामीणों को उनके हक-हकूकों से अलग किया गया तो उनके सामने वन आधारित जीने के तमाम साधन समाप्त हो गये। सरकार ने विकास का जो नया नारा दिया वन अधिनियम से वह भी पूरा नहीं हो पाया। सड़क, स्कूल, चिकित्सालय, खेल के मैदान, पेयजल योजनायें आदि विकास के काम भी इसलिये बाधित होते रहे क्योंकि इसमें बन अधिनियम का काला कानून आड़े आता रहा। परिणामस्वरूप सैकड़ों सड़के और अन्य निर्माण कार्य वर्षों तक शुरू नहीं हो पाये। वर्ष 1989 में वन अधिनियम के खिलाफ व्यापक आंदोलन चला। आंदोलनकारियों ने विकास कार्यों में बाधा बने पेड़ों को काटने का नारा दिया। आंदोलनकारियों ने यह भी सुनिश्चित किया किया कि वह जितने पेड़ काटेंगे उसके तिगुने पेड़ लगाये जायेंगे। इसके पीछे हिमालय की धरोहरों को बचाकर लोगों की मूलभूत जरूरतों को पूरा करने का विचार भी था। नीति-नियंताओं ने पहाड़ में विकास का जो अनियोजित खाका खींचा उससे आम लोगों में हमेशा असंतोष ही रहा। बाद में विधायक निधि ने इसे विकास के तुष्टीकरण के रास्ते तक पहुंचाया। आज भी लोग सड़क और पंचायत घरों के निर्माण की मांगों पर उलझे हैं। इस बीच दुनिया के सामने जलवायु परिवर्तन से पृथ्वी को बचाने की चिंता है। सबकी निगाहें उत्तराखंड जैसे क्षेत्रों पर लगी हैं कि वह किसी तरह यहां के संसाधनों को बचाकर समाप्त हो रहे ऑक्सीजन की पूर्ति करे। इसके लिये जिम्मदार भी यहीं के लोगों को बताया जा रहा है। इस पर राजनीतिक लोगों ने सौदेबाजी भी शुरू कर दी है। सरकारें यहां के संसाधनों को बचाने के बजाए इसके एवज में मुआवजा मांग कर पहाड़ की हवा को बेचने की साजिश में जुट गये हैं।
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक लगातार इस बात की मांग कर रहे हैं कि हमें पर्यावरण संरक्षण के एवज में केन्द्र से मुआवजा मिलना चाहिये। उनका तर्क है कि वन अधिनियम और अन्य वन संरक्षण कानूनों से पहाड़ का विकास बाधित हुआ है। इस पैसे से यहां के जनकल्याण के कामों को आगे बढ़ाया जा सकता है। हमारे नीति-नियंताओं को किसी भी हालत में पैसा चाहिये। विशेष राज्य के पैकेज के नाम पर, कुंभ मेले के नाम पर, पर्यटन को बढ़ाने के नाम पर और अब पर्यावरण संरक्षण के मुआवजे के नाम पर। इस पैसे को खर्च करने की न तो इनके पास समझ है और कभी इस पैसे का सही उपयोग उत्तराखंड में हो पाया है। प्रदेश की राज्यपाल मार्ग्रेट अल्वा ने योग्य मुख्यमंत्री के दावों की पोल पिछले दिनों कुंभ मेले की तैयारियों का जायजा लेते समय खोल दी। उन्होंने निर्माण कार्यो की गुणवत्ता पर बहुत तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुये कहा कि इससे अच्छी सड़कें तो मेरे गांव की हैं। राज्यपाल के इस बयान से उन लोगों को सबक लेना चाहिये जो विकास कार्यों के लिये सिर्फ पैसे को ही महत्वपूर्ण मानते रहे हैं। इस पैसे को खर्च करने के लिये नियोजन की समझ भी जरूरी है। जहां तक मुख्यमंत्री के संसाधनों को बचाने के एवज में पैसे और कम दर में बिजली देने की मांग है वह बकरी को बाघ के खाने के बाद का हो-हल्ला है। वन अधिनियम के आने के बाद गांव की सड़क 18 साल रुकी रही, अस्पताल नहीं बन पाया, स्कूलों में खेले के मैदान नहीं बन पाये लेकिन संसाधनों पर लुटेरों का आना नहीं कम नहीं हुआ। जो वन अधिनियम आम लोगों की परेशानी का सबब बना उसका बड़े पूंजीपतियों पर कोई असर नहीं पड़ा। बड़ी बांध परियोजनाओं को सरकार लगातार मंजूरी देती रही। अब छोटी-बड़ी बाध परियोजनाओं की संख्या 500 से अधिक हो गयी है। जिस उत्तराखंड राज्य की आर्थिकी का आधार बागवानी और इस पर आधारित फल उद्योग को माना जा रहा था उसे भी सरकार के निकट रहने वाले पूंजीपतियों के हवाले किया जा रहा है। अब सरकार और विभिन्न राजनीतिक पार्टियों की शह पर रामदेव ने कचार, जैम, जैली और जूस का कारोबार उत्तराखंड से करने का मन बना लिया है। उसे यही राजनीतिक पार्टियां पुष्पित-पल्लवित कर रही हैं। आयुष प्रदेश का नारा देने वाली सरकार कब चुपके से पूरी जड़ी-बूटियां रामदेव को सौप दे कहा नहीं जा सकता। जंगल लोगों के नहीं, नदियां लोगों की नहीं अब घरों से विस्थापन का दंश लोग झेल रहे हैं। टिहरी के अलावा अन्य बांधों से विस्थापन की पीड़ा और बिगड़ते पारिस्थितिकी परिवर्तन के बीच पंचेश्वर बांध से एक लाख से अधिक लोगों के विस्थापन का खतरा मंडरा रहा है।
मुख्यमंत्री पर्यावरण सरंक्षण और उससे हुये नुकसान की भरपाई का अनुदान मांग रहे हैं। उनकी मांग अपने सोचने के तरीके से जायज भी हो सकती है। लेकिन मुख्यमंत्री यह नहीं समझ पा रहे हैं बाड़ के अन्दर बाघ घुस आया है अब बकरी का बचना संभव नहीं है। जब हिंसक पशुओं के दांत एक बार शिकार कर देते हैं तो वह सिलसिला जारी रहता है। राजनीतिक लोगों की तो आदत हो गयी है मरी बकरी का मुआवजा मांगना। यह पहली बार नहीं हो रहा है। उत्तराखंड के साथ यह होता रहा है। यह सिलसिला रुकेगा भी नहीं। इसका सबसे बड़ा कारण यहां के विकास और संसाधनों को बचाने की सोच न रखने वाले लोगों के हाथ में सत्ता का होना है। यदि ऐसा नहीं होता तो इस बीच पहाड़ के विकास के बारे में गंभीर काम करने के जितने भी मौके आये उनको सबने अपनी नासमझी से गंवाया। केन्द्रीय विश्वविद्यालय, भारतीय प्रबंधन संस्थान, एनआईटी आदि ऐसे मुद्दे थे जिन्हें बहुत गंभीरता से सुझाकर हम एक आदर्श राज्य के सपने को साकार कर सकते थे। इन सभी संस्थानों की स्थापना में कुमांउ-गढ़वाल और अपने राजनीतिक गुणा-भाग के हिसाब से तय करने की प्रवृत्ति रही। यह तब तक ठीक नहीं होगा जब तक विकास का एक सही दर्शन सामने न हो। दुर्भाग्य से राज्य में अपने को बेचकर मुआवजा मांगने वालों की सरकार है।


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