उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन के दौरान जनकवि ‘गिर्दा’ ने एक गीत के माध्यम से राज्य के भावी स्वरूप का खाका खींचा था। उन्होंने इस गीत के माध्यम से सपन्न और आत्मनिर्भर राज्य बनाने की जरूरत पर जोर दिया था। राज्य बनने के लगभग एक दशक बाद इस गीत की प्रासंगिकता अधिक हो गयी है वह इसलिये भी क्योंकि नासमझ लोगों के हाथ में सत्ता होने से अब बेरोजगार आत्महत्या करने पर मजबूर हैं। ‘गिर्दा’ ने बागस्यरौक गीत से अपने गीत की रचना की थी। इस लंबे गीत कुछ पंक्तियां आज राज्य की व्यवस्था सुधारने और नवनिर्माण के लिये प्रेरित करती हैं-
कस हलो उत्तराखंड कस हमार नेता,
कस हलों पधन गौं क कसि होली व्यवस्था।
जड़ि-कंजड़ि, उखेलि सबुकें पिफर फैसाल करूलो,
उत्तराखंड ल्यू उकड़ि मनकस बडूंलो।
भ्यौव नि पडेलि दिदी-भुली, रौ नि पडल भाई,
बरोजगार नि मांजला दिल्ली म कढ़ाई।
सब जतन करिबे, हम यस अलख जगूलो,
उत्तराखंड ल्यूल उकड़ि मनकस बडूंलो
अर्थात हम ऐसा राज्य बनाना चाहते हैं जिसमें ग्राम प्रधान से लेकर बड़ी लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनपक्षीय लोग शामिल होंगे। इस बारे में हम जनता से पूरी बहस कर फैसला करेंगे। इससे अपने मन जैसा राज्य बनायेंगे। ऐसा राज्य जिसमें कोई बहन पहाड़ से कूदकर अपनी जान नहीं देगी, कोई भाई नदी में कूदकर आत्महत्या नहीं करेगा। पहाड़ के बेरोजगार दिल्ली में जाकर बर्तन मांजने को मजबूर नहीं होंगे।
‘गिर्दा’ के इस गीत में उत्तराखंड के उन लाखों लोगों की भावनायें और उम्मीदें समाहित थी जो एक बेहतर राज्य का सपना देखते थे। उसके लिये जनता ने संघर्ष किया, 42 लोगों ने अपनी शहादतें दी। राज्य भी बन गया, लेकिन वह राज्य नहीं जो ‘बागस्यरोक गीत’ में अभिव्यक्त था। उत्तराखंड राज्य इस गीत के बिल्कुल उलट मिला। अर्थात जनभावनाओं को कुचलने और अभिव्यक्ति का गला घोंटने वाला राज्य। सरकारी नीतियों के चलते भाई-बहनों को आत्महत्या के लिये मजबूर करने वाला राज्य। दमन करने वाले पुलिसकर्मियों को पुरस्कृत करने वाला राज्य।
यह गीत राज्य की मौजूदा भाजपा सरकार और उसके मुखिया को आईना दिखाने के लिये काफी है। उन लोंगों के लिये भी जो लोकतंत्र में विश्वास का आवरण ओढे हैं। पिछले दिनों अस्थाई राजधानी देहरादून में शिक्षा मित्रों के साथ जो हुआ उससे इस सरकार के जनविरोधी चरित्र को समझा जा सकता है। लंबे समय से अपनी मांगों को लेकर शिक्षा मित्रा और अनुदेशक धरने पर बैठे हैं। 720 दिन से विधानसभा के सामने धरने पर बैठे इन शिक्षकों की बात सुनने के लिये सरकार तैयार नहीं थी। गणतंत्र दिवस के मौके पर संगठन के अध्यक्ष पूर्ण सिंह राणा ने आंदोलनकारियों की बात न सुनने के विरोध् में टावर पर चढ़कर आत्मदाह का प्रयास किया। इस बहरे गणतंत्र में राणाओं के पास आत्महत्या करने के अलावा चारा भी क्या बचा है? यह घटना उस समय हुयी जब प्रदेश के मुख्यमंत्री अपने लोगों को मानद मंत्री की रेवडियां बांट रहे थे, वि्धानसभा सदस्यों के वेतन में भारी वृद्धि की जा रही थी। सरकार की संवेदहीनता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि सरकार ने राणा और उनके साथियों को संगीन धराओं में बंद कर दिया जबकि लोकतंत्रा में अभिव्यक्ति का गला घोंटने वाले पुलिसकर्मियों को पांच लाख का पुरस्कार भी दे दिया। इतना ही नहीं सरकार के खिलाफ आवाज उठाने वालों को रोकने की बहादुरी करने वाले पुलिस अधिकारी को वीरता सम्मान से नवाजने की तैयारी है।
उत्तराखंड में इस तरह की घटना पहली बार नहीं हुयी है। इस सरकार की नीतियों से आहत कई लोग पहले भी आत्महत्या या आत्महत्या प्रयास कर चुके हैं। इससे पहले एक शिक्षक मित्र ने अपने प्रमाण पत्रों के साथ नदी में कूदकर आत्महत्या कर ली थी। हल्द्वानी में सुशीला देवी अस्पताल के कई निविदाकर्मियों ने जहर पीकर आत्महत्या करने का प्रयास किया था। पिछले दिनों विकलांग संगठन के पदाधिकारियों ने भी आत्मदाह करने की कोशश की थी। ये लोग दो साल से धरने पर बैठे हैं। पिछले दो साल से आंदोलनरत एनटीटी प्रशिक्षितों ने भी कई बार जहर खाकर आत्महत्या करने की कोशिश की। इस सिलसिले के रुकने के आसार भी नहीं हैं। इस समय प्रदेश में दो दर्जन से भी अधिक आंदोलन चल रहे हैं। पिछले दिनों विभिन्न संगठन के पदाधिकारियों ने भी आत्मदाह करने की कोशश की थी। रा्जधानी गैरसैंण को लेकर बाबा उत्तराखंडी और नशे के खिलाफ निर्मल पंडित को आत्मदाह करना पड़ा। यह एक बानगी है उस उत्तराखंड राज्य की जिसकी कल्पना में कहा गया था कि हम किसी भाई को नदी में डूबकर आत्महत्या नहीं करने देंगे, किसी बहन को पहाड़ से गिरकर मरने को मजबूर नहीं करेंगे। दिल्ली में जाकर बर्तन मांजने की मजबूरी नहीं होगी। इस एक दशक में उन सपनों को टूटते हुये लोग देख रहे हैं। सरकार के विकास और लोगों के लिये किये गये बेहतरी के दावों के विपरीत पूरा उत्तराखंड असंतोष की आग में जल रहा है। कर्मचारी संगठनों से लेकर गांवों में मूलभूत समस्याओं को लेकर लगातार आंदोलन चल रहे हैं। असल में राज्य में बारी-बारी से सत्ता में आये लोग कभी ‘बागस्यरक गीत’ के साथ न कभी रहे और न उनकी ऐसी भावना रही। इस सरकार में फिर राणाओं को आत्महत्या के लिये टावरों में चढ़ना पड़ेगा। कोई पुलिस अधिकारी उसे जेल भेजने के एवज में पुरस्कार प्राप्त करता रहेगा।
ब्लाग के मायाजाल में चारू तिवारी जी का हार्दिक स्वागत है. इस ब्लाग के माध्यम से आपके विचार देश-विदेश में रह रहे उत्तराखण्डी लोगों तक पहुंच पायेंगे और इस “मेरापहाड़” का यह कार्य सार्थक सिद्ध होगा.
पुन: स्वागत
उस उत्तराखंड राज्य की जिसकी कल्पना में कहा गया था कि हम किसी भाई को नदी में डूबकर आत्महत्या नहीं करने देंगे, किसी बहन को पहाड़ से गिरकर मरने को मजबूर नहीं करेंगे। दिल्ली में जाकर बर्तन मांजने की मजबूरी नहीं होगी। इस एक दशक में उन सपनों को टूटते हुये लोग देख रहे हैं।
….Jan jaagran ki disha mein saarthak prayas…
Anukarniya aur prashansniya lekh ke liye haardik shubhkamnayne