गंगा को बचाने का नाटक फिर शुरू हो गया है। कोई डॉ. जी डी अग्रवाल हैं। बताया जाता है कि वे पिछले एक-दो साल से बड़े पर्यावरणविद् हो गये हैं। बड़ा नाम है उनका। पिछले साल उत्तरकाशी में गंगा को कुछ किलोमीटर शुद्ध करने के लिये उन्होंने अनशन किया। हिन्दुओं की एक बड़ी जमात उनके साथ खड़ी हो गई, सबको लगा कि हिन्दुओं के आचमन करने के लिये गंगा को अविरल बहना चाहिये। प्रचारित किया गया कि उनके दबाव में सरकार ने भागीरथी घाटी में बनने वाले बांधों पर पुनर्विचार किया।
असल में गंगा को आचमन के लिये बचाने और गाय और गोमूत्र के लिये पालने वाले नासमझों की एक बड़ी जमात है, जो बलात मानसिक शोषण कर एक धारणा और विचार का मुंह ऐसी बातों से दूसरी ओर मोड़ देना चाहते हैं। डा० अग्रवाल को अचानक गंगा को बचाने का ध्यान क्यों आया, यह समझने में किसी को ज्यादा शक्ति लगाने की जरुरत नहीं है। अग्रवाल पहले वैज्ञानिक थे, देश भर की कई परियोजनाओं को हरी झंडी देने वालों में से एक। कभी क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में हुआ करते थे, जीवन भर सरकारी नौकरी, संसाधन और नाम कमाने के बाद भूखों रहने के नाटक के महत्व को वे जानते हैं। विश्व हिन्दू परिषद और गोविंदाचार्य जैसे चिन्तक उनके साथ हैं, उत्तराखण्ड में न सही, दिल्ली के विश्व हिन्दू परिषद के कार्यालय में उन्हें अनशन की ठौर मिल ही जाती है। ऐसे बहुत सारे लोग हैं, जो गंगा और हिमालय को अपने हितों के लिये इस्तेमाल करना जानते हैं।
उत्तराखण्ड की एक विडंबना है, यहां सबके अपने-अपने उत्तराखण्ड हैं। इन उत्तराखण्डों को वह कभी पहाड़ के सेमिनारों या राजधानी दिल्ली में गांधी पीस फाउंडेशन में बेचते रहे हैं। विशुद्ध धन्धा है आंदोलनों को बेचना, इस आन्दोलन में शामिल हैं राज्य में फैले लगभग ४५ हजार एन०जी०ओ०, पुराने आन्दोलनकारी, कथित जनसरोकारों वाले बुद्धिजीवी। गंगा को बचाने की चिन्ता उन्हें सिर्फ अपने स्वार्थों के लिए याद आती है। सदियों से गंगा और हिमालय को बचाने वालों की सुध लेने वाला कोई नहीं है, अग्रवाल जैसे लोगों को गंगा को बचाने का ध्यान बहुत देर में आया। गंगा को बचाने की लड़ाई सिर्फ भिलंगना और भागीरथी के अलावा अलकनन्दा गंगा की मुख्य धारा है, इसमें नंदप्रयाग में नंदाकिनी, कर्णप्रयाग में पिण्डर, रुद्रप्रयाग में मंदाकिनी और देवप्रयाग में भागीरथी मिलती है। इन पांच प्रयागों के मिलन से देवप्रयाग में इसे गंगा के नाम से जाना जाता है। दुर्भाग्य से इस १३५ कि०मी० की गंगा की यात्रा में ६५ बांध प्रस्तावित हैं। अर्थात हर तीन कि०मी० पर एक बांध बनना है, उत्तराखण्ड की छोटी-बड़ी कुल १७ नदियों में ५०० से अधिक बांध बनने हैं। इनमें से निकलने वाली सुरंगों की लम्बाई १५०० कि०मी० से अधिक है।
एक अनुमान के अनुसार अगर ऐसा होता है तो पहाड़ की २८ लाख जनता इन सुरंगों के ऊपर हो सकती है। इससे गंगा और उसकी सहायक नदियों के अस्तित्व को समझा जा सकता है। तब जी डी अग्रवाल जैसे लोगों से सवाल पूछा जाना चाहिये कि गंगा को आचमन और हिन्दू संस्कृति की रक्षा के चश्मे से देखने की मूर्खता से गंगा नहीं बचेगी। गंगा को बचाने के लिये गंगा के पहरुओं को बचाना जरुरी है। हिन्दू परिषद की दलाली करने वालों और पानी के सौदागरों के अनशन और सेमिनारों ने गंगा प्रहरियों को छलने का काम किया है। गंगा पर बन रहे बांधों का दशकों से विरोध कर रही जनता की तकलीफों को सुनने की कोशिश किसी ने भी नहीं की। बांधों के खिलाफ लड़ाई वहां की जनता ने लड़ी है, आज भी वे अपने अस्तित्व और गंगा को बचाने के लिये संघर्षरत हैं। टिहरी बांध के खिलाफ वहां की जनता अंतिम समय तक लड़ती रही, लेकिन नीति-नियंताओं ने एक पूरी संस्कृति को डूबाने में किसी की नहीं सुनी।
बांधों के सवाल पर सरकारों का जनविरोधी चेहरा हमेशा सामने आया है। फलेण्डा से लेकर अब पंचेश्वर बांध तक की लड़ाई यहां के लोगों ने अकेले लड़ी है, उसे किसी कथित पर्यावरणवादी की जरुरत नहीं है। वह उन बांधों के खतरों को ज्यादा जानती है, यहां की जनता न केवल अपने घर-गांव उजड़ने की पीड़ा से आहत है, बल्कि उसे इस बात ने भी मर्माहत किया है कि सरकार आम ग्रामीणों की आवाज को नहीं सुनती है। उसे दिल्ली से आने वाले किसी अग्रवाल की गंगा, धर्म, संस्कृति आदे की लफ्फाजी प्रभावित करती है या उन कथित एन०जी०ओ० की जो इसी के नाम की रोटी खाते हैं। विदेशी एजेंसियों की दलाली से जनता के संघर्षों को कुन्द करते हैं।
दिल्ली और पहाड़ में बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग ऐसा है, जो नदियों और बांधों के आंदोलनों को दिल्ली के गांधी पीस फाउंडेशनों में बेचता है। पहाड़ में इस तरह के बहुत से लोग हैं, जो देश-विदेश के लोगों को अल्मोड़ा और श्रीनगर में बुलाकर अपने लिये अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त करने का रास्ता निकालते हैं। यही वजह है कि कभी सरकार बांधों को निरस्त, तो कभी अपने हिसाब से उन्हें खोलने का फरमान जारी कर देती है। जनता के सवालों को एक बड़े आंदोलन के रुप में आगे बढ़ाने के लिये जरुरी है कि पहाड़ में बन रहे सभी बांधों की लड़ाई को एक साथ लड़ा जाय, इस लड़ाई में आन्दोलन के बिचौलियों को समाप्त करने की जरुरत है।
Dear Charu,
Its an eye opening article for those who blindly support such people without knowing their stand.
Keep it up!!!