डेढ दशक बाद उत्तराखंड में फिर आंदोलन के स्वर मुखर होने लगे हैं। आठ साल बाद जनता अपने को ठगा महसूस करने लगी है। स्थायी राजधानी के बहाने यहां हाशिए में धकेले गये सवाल फिर उठाये जा सकते हैं। इसके लिये वे राजनीतिक दल जिम्मेदार हैं जो कभी राज्य के विरोधी रहे और सत्ता में आने के बाद भी उन्होंने पहाड़ के विकास की अपनी समझ नहीं बदली। राजधानी स्थल चयन के लिये बनी बीरेन्द्र दीक्षित आयोग की रिपोर्ट के पिछले दिनों विधानसभा पटल पर रखते ही पहाड़ से गर्म हवायें आने लगी हैं। आयोग ने देहरादून को राजधानी के लिये सबसे उपयुक्त माना है। चन्द्रनगर गैरसैंण को राजधानी बनाने के लिये उत्तराखंड की जनता में सुगबुगाहट शुरू हो गयी है। यह अचानक आयी प्रतिक्रिया नहीं है। आठ साल, पांच मुख्यमंत्रियों और ग्यारह बार बढाये गये कार्यकाल के बाद जो रिपोर्ट आयी वह यहां की जनता को चिढ़ाने वाली है। गैरसैंण को राजधानी के लिये उपयुक्त न मानने की सिफारिश कर आयोग ने भाजपा और कांगे्रस के उस विचार को मजबूत किया है जो किसी भी स्थिति गैरसैंण को राजधानी नहीं बनने देना चाहते हैं। स्थायी राजधानी का मामला न तो राजनीतिक पूर्वाग्रह है और न ही प्रदेश के बीचोंबीच राजधानी बनाने की जिद, सही अर्थों में यह आंदोलन यहां के अस्तित्व, अस्मिता और विकास के विकेन्द्रीकरण की पुरानी मांग है।
गैरसैंण को राजधानी बनाने की जनता की मांग नई नहीं है। राज्य आंदोलन के शुरुआती दौर से ही चमोली जनपद और राज्य के बीचोंबीच स्थित इस खूबसूरत स्थान को लोगों ने राजधानी के लिये उपयुक्त माना। कभी राज्य आंदोलन का ध्वजवाहक रहे उत्तराखंड क्रान्ति दल ने जनवरी 1992 में बागेश्वर में अपने घोषणापत्र में गैरसैंण का नाम सुझाया। अपने स्थापना दिवस पर 25 जुलाई 1992 को इसे पेशावर कांड के नायक वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली के नाम पर इसका नामकरण चन्द्रनगर कर इसे राज्य की राजधानी घोषित कर दिया। तब से जब भी राजधानी की बात हुयी पहाड़ के लोगों ने कभी और जगह के बारे में सोचा भी नहीं। अविभाजित उत्तर प्रदेश में वर्ष 1994 में तत्कालीन मुलायम सिंह सरकार ने वरिष्ठ मंत्री रमाशंकर कौशिक की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया। इस सरकारी समिति ने अपनी जो संस्तुतियां प्रस्तुत कीं उनमें राज्य के 68 प्रतिशत लोगों ने गैरसैंण चन्द्रनगर को राजधानी के लिये सबसे उपयुक्त माना। भाजपा और कांग्रेस ने हमेशा इस मांग के खिलाफ अपनी साजिशें जारी रखीं। गैरसैंण को राजधानी न बनाने के लिये उन्होंने कुतर्क गढ़ने भी शुरू कर दिये। राजधानी के बारे में वे लोग भी तर्क देने लगे जिन्हें यहां का भूगोल पता नही है। जिन लोगों ने कभी गैरसैंण देखा नहीं वे भी उसके विरोध में बयान देने लगे। सरकार भी बार-बार लोगों का ध्यान इससे हटाने लगी।
नवम्बर, 2000 को जब राज्य बना तो पहली अंतरिम सरकार भाजपा की बनी। उसने दो काम किये पहला उत्तराखंड का नाम बदलकर उत्तरांचल करना और दूसरा राज्य की राजधानी के लिये आयोग का गठन करना। दोनों की काम जनभावनाओं के खिलाफ थे। राजधानी के मसले पर तो भाजपा ने अलोकतांत्रिक काम किया उसने जनमत को आयोग की कसौटी में जांचने की साजिश की। राज्य पहली चुनी हुयी सरकार कांग्रेस की बनी। उसने इस आयोग के कार्यकाल को लगातार बढ़ाया। मौजूदा भाजपा शासन में इस आयोग को दो बार बढ़ाया गया। असल में देहरादून को राजधानी बनाने का माहौल इसलिये तैयार किया जाता रहा है कि जनता के पैसे पर ऐश करने वाले सुविधाभोगी नेता, नौकरशाह और माफिया का गठजोड़ गैरसैंण को किसी भी हालत में राजधानी नहीं बनाना चाहता। राजधानी के लिये बने दीक्षित आयोग ने जो रिपोर्ट पेश की है वह न केवल हास्यास्पद है, बल्कि नीति-नियंताओं की कमजोर सोच का परिचायक भी है। लंबी कवायद और करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद वही हुआ जिसकी सबको आशंका थी। आयोग की संस्तुतियों को मानना हांलाकि सरकार के विवेक पर निर्भर करता है, लेकिन इस पूरी कवायद में राजनीतिक दलों का जो रवैया रहा उसे पूरा करने मे दीक्षित आयोग ने पूरी भूमिका निभाई। वह सरकार के एजेंट के रूप में काम करती रही। जनता इस बात से भी आहत है कि आठ साल में आयोग की जो रिपोर्ट आयी है उसे अभी तक गैरसैंण के बारे में ही जानकारी नहीं है। आयोग ने गैरसैंण को अल्मोड़ा में बताया है, जबकि यह चमोली जनपद में है। इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति, उंचाई और अन्य विवरण भी आयोग को मालूम नहीं है। इससे सरकार के जनविरोध और जनभावनाओं को कुचलने की प्रवृत्ति का पता चलता है।
दीक्षित आयोग ने इन आठ सालों में गैरसैंण की बात को कमजोर करने का ही काम किया। एक तरफ आयोग किसी न किसी बहाने अपना कार्यकाल बढ़ाता गया और दूसरी तरह सरकारें अस्थायी राजधानी देहरादून में निर्माण कार्य कराती रही। आयोग ने अपने पूरे कार्यकाल में जनभावनाओं के विपरीत काम किया। उसने कभी जनता से सीधे संवाद करने की कोशिश नहीं की। आयोग बार-बार जिन खतरों को राजधानी के लिये बताता रहा वे बेहत कमजेार और हल्के थे। आयोग की सड़क, रेलमार्ग, हवाई यातायात और पानी की उपलब्धता जैसे मुद्दों को उठाकर एक सोची समझाी साजिश के तहत गैरसैंण की मांग को कमजोर किया है। आयोग तमाम भूगर्भीय परीक्षणों का हवाला देते हुये वह यह साबित करती रही कि गैरसैंण राजधानी के लिये उपयुक्त नहीं है। असल में पूरा मध्य हिमालय ही भूगर्भीय दृष्टि से संवेदनशील है। देहरादून से लेकर टनकपुर तक की पूरी पट्टी सबसे खतरनाक जोन में है। गैरसैंण में तीन सौ साल से बने मंदिर और डेढ सौसाल पुराने तीन मंजिल के मकान भारी भूकंप के झटकों के बावजूद नहीं गिरे तब राजधानी बनने मात्र से यहां भूचाल आ जायेगा यह समझ से परे है। सरकार को यह भी समझना चाहिये कि यदि गैरसैंण को इस तरह के नुकसान की आशंका है तो उसे सबसे पहले यहां के गांवों के विस्थापन की व्यवस्था करनी चाहिये, वरना सिर्फ राजधानी के लिये इस तरह के खतरों को प्रचारित करना बंद करे। जब कथित विकास के नाम पर लोगों को विस्थापित कर नई टिहरी जैसे शहर बसाये जा सकते हैं जो गैरसैंण को राजधानी के लिये विकसित करने में सरकार क्यों परेशान हो जाती है यह समझ से बाहर है। मौजूदा समय में उत्तराखंड की सत्रह नदियों में ढाई सौ से अधिक बांध प्रस्तावित हैं उनमें से 700 किलोमीटर की सुरंगें बनाई जा रही हैं। इसे विकास का माॅडल बताया जा रहा है। विकास के विकेन्द्रीकरण की सोच को लेकर राज्य के केन्द्र में बनने वाली राजधानी के लिये कुतर्क पेश कर सरकार और राजनीतिज्ञ जनविरोधी रास्ता अख्तियार कर रही है।
टिप्पणीयाँ