उत्तराखण्ड के मौजूदा सवालों को समझने के लिये हम अतीत के कई ऐतिहासिक संदर्भों को को उठाकर उनकी आज की प्रासंगिकता को जोड़कर देख सकते हैं। इस बीच कई ऐसे मौके आये और आने वाले हैं जिनसे संवाद का एक बड़ा फलक तैयार किया जा सकता है। पिछले दिनों उत्तराखण्ड की पत्रकारिता के युग पुरुष आचार्य गोपेश्वर कोठियाल की जन्म शताब्दी पर एकजुट हुये समाज के विभिन्न क्षेत्रों की प्रतिभाओं ने मौजूदा सवालों पर चिन्तन किया। यह मौका कई संदर्भों में बहुत महत्वपूर्ण था। पहला आज के दौर की पत्रकारिता में पक्षधरता की तलाश और दूसरा जनसरोकारों के लिये प्रतिबद्ध नई पीढ़ी को उस धारा से जोड़ने का काम। उत्तराखण्ड का मौजूदा दौर आजादी से पहले के पहाड़ को समझने का भी है। क्योंकि जिन संदर्भों में हम आचार्य कोठियाल और युगवाणी को याद करते हैं, आज पत्रकारिता में उसी असहमति और प्रतिकार की जरूरत है। जंगलात, पानी और जमीन के सवाल आज भी उसी तरह मौजूद हैं जिस तरह टिहरी रियासत के समय थे। उत्तराखण्ड में प्राकृतिक धरोहरों पर आश्रित जनता के लिये इनकी हिफाजत हमेशा प्रमुखता में रही है। तीस के दशक में तिलाड़ी और चालीस के दशक में सालम और सल्ट में अपनी धरोहरों को बचाने के लिये ही आंदोलनकारियों ने अपनी शहादतें दी थी। टिहरी में राजा का कानून और शेष पहाड़ में अंग्रेजों का दमन उस समय की युवा पीढ़ी को अपने-अपने तरह से प्रतिकार के लिये तैयार कर रही थी। टिहरी में आंदोलन को किसी भी रूप में समर्थन करना देशद्रोह था। ऐसे समय में जब पूरे देश में आजादी की लड़ाई नई अंगडाई ले रही थी, वहीं टिहरी में राजशाही से मुक्ति के लिये अलग इबारत भी लिखी जा रही थी। उस दौर में सच और प्रजा के पक्ष में खड़ा होना बड़ी चुनौती थी। पत्रकारिता के माध्यम से उस चुनौती को स्वीकार करने का जज्बा और उसे परिणाम तक पहुंचाने की जिद का नाम ही युगवाणी जैसी पक्षधरता ही कर सकती थी। देश को आजादी मिली और टिहरी रियासत से मुक्ति भी, लेकिन आजादी के साठ दशक बाद स्वत्रंत्र कहे जाने वाले देश में जनता को उन्हीं सवालों से लड़ना पड़ रहा है। इसलिये आचार्य कोठियाल जी की जन्म शताब्दी की प्रासंगिता और बढ़ गयी है।
जनपक्षधरता का जो सवाल लंबे समय से उठाया जा रहा है वह पत्रकारिता के साथ ही नहीं समाज के प्रत्येक क्षेत्र के साथ जोड़ा जाना चाहिये। उत्तराखण्ड की पत्रकारिता और जनसरोकारों की पूरी यात्रा अबाध गति से चलती रही है। युगवाणी, कर्मभूमि, गढ़वाली, शक्ति, स्वाधीन प्रजा से लेकर पर्वतीय, युवजन मशाल, नैनीताल समाचार से लेकर आज कई छोटी पत्र-पत्रिकाएं इस धारा का प्रतिनिधित्व करती हैं। इन्होंने ही सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक सवालों को न केवल उठाया है बल्कि इन्हें आगे ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाई है। आजादी के बाद सत्तर के दशक में इसी पक्षधरता ने आंदोलनों का एक बड़ा मंच तैयार किया। 26 मार्च 1974 को चमोली जनपद के रैंणी गांव में महिलाओं की एक आवाज ने पूरी दुनिया को जो संदेश दिया वह चिपको आंदोलन के रूप में सामने आया। इस आंदोलन को इसी महीने 36 वर्ष पूरे हो गये हैं। यह मौका भी इस बात को याद करने का है कि अपनी धरोहरों को बचाने के लिये गांवों से जो आवाज उठी उमें सबसे बड़ी बात पक्षधरता की है। गांवों में अंदर जिस तरह हकों के लिये उठने वाली आवाज को कुंद किया जा रहा है उसके खिलाफ गौरा देवी का साढ़े तीन दशक पहले लिया गया संकल्प सबका मार्गदर्शन दे सकता है। जिस पहाड़ से जंगलों को बचाने की आवाज सुनी गयी थी वहीं जल, जंगल और जमीन पूंजीपतियों के हवाले किये जा रहे हैं। उस समय जंगलों को ठेकेदारों और कुछ कंपनियों को तीस साला एग्रीमेंट पर दिया जा रहा था, आज पूरी नदियां जेपी और थापर के हवाले कर दी गयी हैं। अपने घर में बेगानी होती गौरा की सुध लेने के लिये के लिये भी पक्षधरता को खोजना पड़ रहा है।
इस बीच 24 मार्च को शहीद उमेश डोभाल की पुण्यतिथि का मौका भी जनपक्षधरता को याद करने का भी मौका है. उमेश को शराब माफिया के खिलाफ एक लंबी जंग में अपनी जान देनी पड़ी। उत्तराखण्ड में जंगलात और शराब की लड़ाई बहुत पुरानी है। जब भी पहाड़ के विकास की बात आती रही है नशामुक्त उत्तराखण्ड का नारा बुलंद होता रहा है। व्यापक शराबबंदी आंदोलन और उमेश की शहादत के बाद भी पहाड़ में नशे के व्यापारी अपना नेटवर्क बढ़ाते रहे। राजनीति के साथ शराब ने जिस तरह पहाड़ में प्रवेश किया है उसके खिलाफ एक बड़ी मुहिम की जरूरत है। 24 मार्च को जनपक्षधरता की हिमायत करने वाले तमाम लोग पौड़ी में जुटकर इस मुहिम को आगे बढ़ायेंगे ऐसी उम्मीद है। इस वर्ष जनता के साथ हमेशा खड़े रहने वाले राजू रावत हमसे बिछड़ गये थे उन्हें भी पौड़ी में सभी साथी याद कर जनपक्षधरिता के अभियान को आगे बढ़ायेंगे।
इन अवसरों का जिक्र इसलिये जरूरी है क्योंकि इन पड़ावों ने समाज को आगे बढ़ने का साहस दिया है, समझ दी है और उस पर चलने वालों का एक समाज दिया है। उत्तराखण्ड में इन तीनों अवसरों पर दिये जाने वाले संकल्प निश्चित रूप से राज्य की दिशा को तय कर सकते हैं। लेकिन एक सबसे बड़ा सवाल खड़ा है हम किस तरफ हैं। उत्तराखण्ड में राजनीतिक अपसंस्कृति और राष्टीय राजनीतिक दल इन तीनों अवसरों पर उठने वाले सवालों के लिये जिम्मेदार है। हमारे लिये अभी यह तय कर पाना कठिन हो रहा है कि हम किस तरफ हैं। हम जनपक्षधरता को किस तरह परिभाषा करते हैं। अब भी हमारे कार्यक्रमों इस चिन्ता की बजाय सत्ता में बैठे लोगों का आतिथ्य बड़ा है। राज्य की आबकारी नीति को माफिया के हितों में बनाने वाले, बांधों से लोगों का बेघर करने वालों को, नदियों को बेचने वालों जनविरोध पर खड़े राजनीतिक दलों के इन कांर्यक्रमों में भाषण सुनना यदि हमारी मजबूरी है तो जनपक्षधरता की नई परिभाषा करें। आचार्य कोठियाल, गौरा देवी, शहीद उमेश डोभाल और राजू रावत को याद करते हुये उम्मीद है कि आने वाला कल फिर उत्तराखण्ड में नई चेतना की सुबह लायेगा।
टिप्पणीयाँ