उत्तराखण्ड के लोक में एक कथा प्रचलित है, इस लोक कथा के अनुसार किसी विधवा के पास बहुत दिनों बाद उनके कोई जानने वाले पहुंचे और उन्होंने विधवा से हाल-चाल जाना। महिला ने बतलाया कि बाकी सब तो ठीक ही रहा, बस एक वही नहीं रहे। राज्य के दस वर्ष इस महिला के दुःख से कम नहीं हैं, और तो यहां भी सब ठीक ही हो रहा है, एक वही नहीं रहे। अब हमारी भी समझ में यह नहीं आ रहा है कि जब वे ही नहीं रहे तो ठीक क्या हो रहा है? इस बात को समझने के लिये इस राज्य की परिकल्पनाओं और उसकी हकीकत को गंभीरता से लेने का समय है। आजादी से पहले और आजादी के बाद पहाड़ के शोषण और दोहन, जिसे हमने देखा, समझा और सबक लिया। हमारे लिये सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह रही कि तमाम क्षेत्रीय ताकतों के अहम ने पहाड़ को भारी नुकसान पहुंचाया। वर्ष 1994 में जब एक निर्णायक आन्दोलन चला, तब भी हमारी लड़ाई एक मंच पर नहीं आ पायी। इसका फायदा उन राष्ट्रीय दलों ने उठाया जो कभी राज्य के खिलाफ थे। क्षेत्रीय ताकतों के साथ दिक्कत थी कि वे एक-दूसरे का नेतृत्व स्वीकार नहीं कर सकते थे।
क्षेत्रीय ताकतों की सबसे बड़ी कमजोरी यह भी रही कि उन्होंने कभी भी यहां के मुद्दों को राजनीतिक फलक पर नहीं देखा। यहां रामलीला कमेटियों की तरह हर साल टेंट लगते-उखडते रहे। वर्ष १९९४ के आन्दोलन में जब राष्ट्रीय दल पूरे आन्दोलन में घुसपैठ कर चुके थे, तब भी हमारे लोग इस बात को प्रचारित करने में लगे थे कि यह आन्दोलन स्वतः स्फूर्त है। इस झूठ को बार-बार बोला गया, यह भी कहा गया कि यह नेतृत्वविहीन आन्दोलन है। इस तरह की समझ ने राज्य बनाने का श्रेय भाजपा और कांग्रेस को दे दिया। उत्तराखण्ड भारत का एक ऐसा राज्य है, जहां राज्य विरोधी लोग सत्ता में हैं, इतना ही नहीं अपने-अपने दलों के लिये आन्दोलन के दौर में दलाली करने वाले तमाम लोग अब सत्ता की लूट में शामिल हैं। सत्तर के दशक और उसके बाद आन्दोलन को दिशा देने वाले लोगों का ऐसा बैंड बजेगा और वैचारिक रुप से इतना पतन होगा, कभी सोचा भी न था। ये सभी संगठन और व्यक्ति आज पहाड़ में उग आये एन०जी०ओ० के सहारे राजनीति और अपने अस्तित्व को बनाये रखना चाहते हैं, जो पहाड़ की लूट में सबसे आगे हैं। हमारे आन्दोलन अब दिल्ली के सेमिनारों में है, हमारे बहुत से अग्रज अब राष्ट्रीय स्तर पर ही पहाड़ की बात करते हैं। उत्तराखण्ड के शहरों में भी जब कार्यक्रम होते हैं तो देश-विदेश के बड़े लोगों को बुलाने का चलन हो गया है। जिनको पहाड़ की बातों को बेचने में महारथ हासिल है और वे अभी और जिन्दा रहना चाहते हैं।
उत्तराखण्ड क्रान्ति दल के लोगों ने जिस तरह से अपना जमीर बेचा है, वह क्षेत्रीय ताकतों के लिये नई संभावनाओं के सभी रास्ते बन्द कर देता है। असल में इन आन्दोलनकारियों में अलग-अलग टापू थे, इन टापुओं में उतने ही लोगों के लिये जगह थी, जो इसके कर्ता-धर्ता ने बना दी थी। उनके अलावा यहां कोई और खड़ा ही नहीं हो सकता है, अंग्रेजों ने भी हमारे देश में कई मठों का निर्माण किया, इनमें जिन्होंने शीश नहीं नवाया, उन्होंने उनका हुक्का-पानी ही बन्द कर दिया। ये टापू आज भी हैं और मठ भी हैं, इनके मालिक भी हैं और सन्त भी हैं। जब तक इन मठों को तोड़ा नहीं जायेगा, पहाड़ राष्ट्रीय राजनीतिक दलों का ऐशगाह बना रहेगा। यह बात आज तक के अनुभव से हमने समझी है। हमें अब भी इतिहास की भूलों से सबक लेकर एक बेहतर उत्तराखण्ड बनाने की ओर सोचना होगा। इस समय भी वही सवाल यहां पर हैं, जो सत्तर के दशक में थे या बाद में जो राज्य आन्दोलन में तब्दील हुये। ये सवाल अब और तल्ख रुप में हमारे सामने हैं, हम हिमालय की हिफाजत का सपना देखते थे, पहाड़ के शोषण और दोहन के खिलाफ हमारे नारे थे, गीत थे। लेकिन सारे जतन करने और ४२ शहादतों के बाद राज्य मिला, लेकिन अब वही जल, जंगल और जमीन के प्रश्न फिर से सामने हैं। जिन बांधों का हम हमेशा विरोध करते रहे, वहां इज एक नहीं पांच सौ से अधिक बांध बनने हैं। आजादी के बाद पहाड़ से ५२ लाख लोगों ने स्थायी रुप से पलायन किया है, यह जानकर आश्चर्य होगा कि राज्य बनने के बाद २२ लाख लोग स्थायी रुप से पहाड़ को छोड़ चुके हैं।
उत्तराखण्ड के पौने दो लाख घरों में ताले लट्क गये हैं, राजनीतिक रास्ते से शराब आज भी घर-बाखलियों तक पहूंच रही है। सख्ती से लागू वन अधिनियम ने यहां के हक-हकूकों को छीना है, उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद लूट का एक नया उपनिवेश बना है। ऐसे में इस आन्दोलनों की एक यात्रा से हमें लगता है कि सत्तर के दशक से समस्यायें ज्यादा बढ़ी हैं। उस समय, समय की लड़ाई लड़ने वाले लोग थे, अब पहाड़ को समझने वाली नई पीढी की एक जमात आगे आ रही है। हम आन्दोलन की एक पूरी धारा के निहितार्थों को ईमानदारी से समझें। पुराने लोगों के अनुभव और नये लोगों की ऊर्जा से हम उत्तराखण्ड के नवनिर्माण का रास्ता तैयार कर सकते हैं, एक दशक बाद राज्य के लिये नई दिशा के लिये सोचने का यह एक रास्ता हो सकता है।
Aapne Jo bhi likha bah sahib likha par age kya aur kaise? Is par bhi apne vichar rakhen. Kya karne ki socket haein/kar raven haven.
आदर्णीय तिवारी जी , आपकी बातें बिलकुक सत्य हैं ! आज भी हम लोग रास्ट्रीय सोच के आवरण से बहार नहीं निकल पाए हैं ! जल जंगल जमीं हमारे सब के सयुंक्त मुद्दे थे, हैं, और रहेंगे ! अब हल होंगे की नहीं, कोई नहीं कह सकता, क्योंकि इन मुद्दों को उठाने वाला दल ही जब इन्हें भुला चूका तो दुसरो से क्या उम्मीद करनी ! बाकि हमारे राष्ट्रिय दलों की पहले से चली आ रही साजिश जिसमे गड़वाल वि. कुमाऊ , ठाकुर वि. ब्राहमण , छोटी धोती वि. बड़ी धोती , टेहरी वि. पौड़ी आदि से हम, आज भी पार नहीं हो सके हैं ! बाकि बची हमारे नेताओं की सोच तो हमारे नेता तो गाँव के पुराने ठेकेदार लोग हैं जो सिर्फ पैसे बाँट कर ठेका लेना और कमीशन देकर पेमेंट लेना जानते हैं , ये तो सिर्फ आपने फायदे की ही योजना बना सकते हैं प्रदेश की नहीं !