पिछले महीने सुप्रसिद्ध समाजवादी विचारक सुरेन्द्र मोहन हमारे बीच नहीं रहे। उनके जाने के साथ ही समाजवादी चिन्तन की एक धारा का अवसान हो गया। एक समाजवादी चिन्तक के रूप में हम उन्हें जानते-समझते रहे हैं। मेरे लिये लिये यह गौरव की बात रही है कि मुझे उनके साथ कुछ समय रहने का मौका मिला। उनकी सहजता, विद्वता, जनसरोकारों के लिये एक प्रतिबद्ध जीवन ने ऐसा वैचारिक धरातल तैयार किया, जिसमें सब खड़े हो सकते थे। उनके साथ जहां समाजवाद के पुरोधाओं की एक जमात थी, तो हमारे जैसे नये लोग भी थे जो उस समय पैदा हुये थे जब समाजवादी धारा ने देश ने गैर कांग्रेसवाद को हकीकत में बदलने का संघर्ष किया।
आपातकाल के समय देशभर में युवाओं की नई पौंध जब बदलाव की लड़ाई की मुख्यधारा में शामिल हुई तो उत्तराखण्ड भी उससे उछूता नहीं रहा। बहुत सारे युवा और छात्र इस मुहिम में शामिल हो गये। बाद में हमारी राजनीतिक चेतना इसी धारा के लोगों के साथ आगे बढ़ी। नैनीताल में जगन्नाथ मिश्रा, रामदत्त जोशी, प्रताप भैया, जसवन्त सिंह बिष्ट आदि के नाम हम सुनते रहे थे। छात्रों की एक बड़ी जमात ऐसी भी थी जो संगठनात्मक रूप से भले ही इस धारा के साथ न हो, लेकिन पूरे आंदोलन में बदलाव के साथ खड़ी रही। हम उस समय स्व. विपिन त्रिपाठी के सबसे नजदीक रहे। उन्होंने सबसे पहले हमें सुरेन्द्र मोहन जी के विचारों और कृतित्व से परिचित कराया। बाद में पत्रकारिता और सार्वजनिक जीवन में उनके विचारों के साथ और निकटता हुई। आंदोलन के दौर में त्रिपाठी जी कई बार आपातकाल में सुरेन्द्र मोहन के संस्मरणों से उनको जानने-समझने का रास्ता निकाल लेते थे। कुमाऊं में समाजवादी धारा से उनके लगाव ने हमेशा उनके प्रति और आकर्षण पैदा किया, लेकिन उनसे मिलना बहुत देर बाद हुआ।
दिल्ली आने के बाद ‘दि संडे पोस्ट’ के संपादकीय विभाग में काम करते हुए उनसे बहुत संक्षिप्त सी मुलाकातें हुयीं। उस समय ‘दि संडे पोस्ट’ उनके संपादन में समाजवाद पर एक पुस्तक प्रकाशित कर रहा था। उन दिनों मैं प्रखर समाजवादी स्व. विपिन त्रिपाठी पर एक पुस्तक पर काम कर रहा था। एक साल बाद जब पुस्तक बनकर तैयार हुई तो तय किया गया कि त्रिपाठी जी सुरेन्द्र मोहन के विचारों से प्रभावित थे, तो उन्हीं से पुस्तक का विमोचन कराया जाये। स्व. त्रिपाठी जी के सुपुत्र विधायक पुष्पेश त्रिपाठी, काशी सिंह ऐरी और मैं उन्हें आमंत्रित करने उनके आवास पर गये। उन्होंने बड़ी आत्मीयता से हमसे न केवल बात की, बल्कि पहाड़ से जुड़े अपने कई संस्मरण भी सुनाये। वे उस समय के पहाड़ के सभी समाजवादियों के नाम और पते अच्छी तरह जानते थे। हमें यह जानकर बहुत सुखद आश्चर्य हुआ कि संगठन और विचार के प्रति इस उम्र में भी उनकी प्रतिबद्धता उसी मजबूती के साथ है, जैसी साठ-सत्तर के दशक में। इस तरह की मूल्यों के प्रति जिजीविषा सुरेन्द्र मोहन जैसे लोगों में ही हो सकती है। उन्होंने हमसे यह भी पूछ लिया कि जॉर्ज, शरद यादव, मोहन सिंह आदि को बुलाया या नहीं। हमें उनकी उम्र और स्वास्थ्य को देखते हुये सुदूर अल्मोड़ा जनपद के द्वाराहाट क्षेत्र में जाने की चिंता थी। उन्होंने खुद ही इस समस्या का समाधान भी कर दिया। बताया कि उनके पास भूतपूर्व राज्यसभा सांसद का रेलवे पास है। इसमें मैं और मंजू मोहन (उनकी पत्नी) आ सकते हैं, काठगोदाम तक आ जायेंगे।
तीस अगस्त को वे काठगोदाम रेलवे स्टेशन पर आ गये। हमने द्वाराहाट जाने के लिये गाड़ी की व्यवस्था भी कर दी, लेकिन उस दिन रानीखेत एक्सप्रेस के लेट हो जाने के चलते कार वाला वापस आ गया। हम लोग समझ रहे थे कि वे कार से आ रहे हैं, बाद में वे एक टैक्सी से द्वाराहाट पहुंचे। वे तय कार्यक्रम से बहुत देर बाद पहुंचे, लेकिन उनको सुनने के लिये लोग देर तक बैठे रहे। पुस्तक विमोचन के अवसर पर उन्होंने अपने वक्तव्य में जो बातें कहीं, वे हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण थीं। उन्होंने पूरी पुस्तक पढऩे के बाद उन अनछुए पहलुओं की जानकारी भी दी जो इस पुस्तक में बहुत जरूरी थीं। हमें बाद में इस बात का एहसास भी हुआ कि प्रकाशन से पहले सुरेन्द्र मोहन जी को विषयवस्तु दिखा देते तो किताब और उपयोगी बन सकती थी। वापसी में काठगोदाम तक सुरेन्द्र मोहन और उनकी पत्नी मंजू मोहन के साथ आना हुआ, यह मेरे लिए अमूल्य था। द्वाराहाट में वर्ष १९७२ में मधु लिमये की सभा, १९७३ में नैनीताल में युवजन सभा के अधिवेशन से लेकर उत्तराखण्ड में समाजवाद के तमाम पड़ावों का जिक्र उन्होंने किया। कफड़ा में गाड़ी रोककर मैंने उन्हें विमलानगर की वह जगह दिखाई, जहां १९३९ में देश के समाजवादियों का एक बड़ा सम्मेलन हुआ था। उनकी इन बातों में गहरी रुचि थी। सुरेन्द्र मोहनजी समाजवादी विचारधारा के चलते-फिरते संस्थान थे। वर्ग विहीन, जाति विहीन और समतामूलक समाज के लिये उनका समर्पण उम्र भर रहा। सार्वजनिक जीवन में मूल्यों और सिद्धांतों के प्रति उनकी निष्ठा ही उन्हें सुरेन्द्र मोहन बनाती है। उनका जाना समाजवादी धारा के ज़गत का अवसान है।
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