योजना आयोग ने उत्तराखण्ड की वर्ष 2010-11 के लिये 6800 करोड़ की मंजूरी दी है। यह राशि पिछले वर्ष की तुलना में 1225.50 करोड़ रुपये अधिक है। इस परिव्यय का 33.18 प्रतिशत भाग सामाजिक सेवाओं एवं समाज कल्याण के लिये, 29.16 प्रतिशत भौतिक संरचना, 23.12 प्रतिशत सामान्य सेवाओं, 7.5 प्रतिशत कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों और 7.33 प्रतिशत ग्रामीण विकास के लिये रखा गया है। योजना आयोग राज्यों के लिये प्रतिवर्ष इन परिव्ययों की घोषणा करता है। राज्य के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल ने इस योजना के लिये 360 करोड़ रुपये की अतिरिक्त सहायता की मांग की थी। उन्होंने केन्द्रीय सहायता प्राप्त योजनाओं के लिये 90 और 10 के अनुपात में केन्द्रीय सहायता का आग्रह किया। मुख्यमंत्री ने राज्य को ग्रीन बोनस के तौर पर पांच हजार करोड़ रुपये अतिरिक्त देने की मांग भी की। इसके अलावा विशेष औद्योगिक पैकेज को 2020 तक बढ़ाने की जरूरत और पेयजल पंपिंग योजनाओं के लिये 500 करोड़ रुपये की विशेष केन्द्रीय सहायता अलग से दिये जाने का अनुरोध किया। फिलहाल योजना आयोग ने इस वर्ष के परिव्यय के लिये 1225.50 करोड़ की स्वीकृति दे दी। लगे हाथ भाजपा के नेताओं ने हवाई अड्डे पर ज्यादा पैसा लाने पर अपने मुख्यमंत्री का स्वागत भी कर डाला। यह हमेशा होता आया है, क्योंकि पार्टी के लोगों को न योजना के आकार के बढ़ने के बारे में कोई तकनीकी जानकारी होती है और न विकास पर खर्च होने पैसे के बारे में समझ। वे प्रतिवर्ष बढ़ने वाले योजना परिव्यय को अपने नेताओं की उपलब्धि मान लेते हैं। राज्य बनने बाद योजनागत परिव्यय का आकार बढ़ता रहा है। अविभाजित उत्तर प्रदेश में पर्वतीय क्षेत्रों के लिये यह 650 करोड़ रुपये था। राज्य बनने के बाद यह राशि 1000 करोड़ से लेकर 6800 करोड़ तक बढ़ चुकी है।
प्रतिवर्ष योजनाओं के आंकड़ों का खेल उत्तराखण्ड सरकार के लिये सुरक्षा कवच का काम करते हैं, इससे सरकार को अपनी विफलताओं को आंकड़ों में उलझाने का मौका मिल जाता है। यह जनविरोधी सरकारों के लिये बहुत जरूरी होता है। राज्यों के लिये योजना आयोग से मंजूर की जाने वाली योजना राशि सरकारी व्यवस्था की एक सामान्य प्रकिzया है। राज्य के विकास एव मूलभूत जरूरतों के लिये दी जाने वाली इस राशि में थोड़ा ‘बारगेनिंग’ और राजनीतिक ‘एप्रोज से बढ़ाया जा सकता है। इसमें पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी को महारथ हासिल था। वे उत्तर प्रदेश के तीन बार मुख्यमंत्री, केन्द्र में मंत्री और योजना आयोग के उपाध्यक्ष रह चुके थे। जब तक वे मुख्यमंत्री रहे योजना का आकार बढ़ता गया। इसी धौंस के चलते कई बार उनके समर्थक उन्हें योग्य और बड़ा नेता मानने की गलतफहमियां पालते रहे। ऐसा ही एक मौजूदा मुख्यमंत्री निशंक के समर्थक समझ रहे हैं। दरअसल ऐसा होता नहीं है कि किसी तिवारी या निशंक की चिकनी-चुपड़ी बातों में आकर केन्द्र अपनी थैली का मुह खोल दे, लेकिन जब योजना राशि मंजूरी का समय आता है तो सत्तारूढ़ सरकारें और उनकी पार्टी इसे अपन उपलब्धियों के रूप में शामिल कर लेती हैं।
राज्य के पक्ष और विपक्ष के नेता राज्य बनने के बाद लगातार विशेष पैकेज की बात करते रहे हैं। उनकी इस मांग से लगता है कि पैकेज मिलते ही पहाड़ के विकास का नक्शा बदल जायेगा और यहां की सारी समस्यायें खुद-ब-खुद हल हो जायेंगी। इन नौ सालों में भाजपा-कांगेस की बारी-बारी से सरकारें आया हैं। अब तो भाजपा के साथ वह क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टी उक्रांद भी है जो अपने संसाधनों से ही राज्य का नक्शा बदलने का दम भरती थी। कई योग्य मुख्यमंत्री आये। विशेषकर नारायण दत्त तिवारी और निशंक को तो प्रचार भी खूब मिलता है कि अगर वे नहीं हाते तो पहाड़ भी नहीं होता। इन दोनों के समय में योजना के आकार में भारी वृद्धि हुयी है, लेकिन विकास का पहिया वहीं रुका है जहां से बात शुरू हुयी थी। योजना आयोग से अधिक पैसा मिलना विकास की गारंटी नहीं होती। विकास प्राथमिकतायें और संसाधनों के सही उपयोग पर निर्भर करता है। दुर्भाग्य से उत्तराखण्ड में विकास की प्राथमिकतायें पहले तो तय नहीं है, यदि हैं भी तो उसके सही उपयोग और कार्य संस्कृति के अभाव में वह एक वर्ग विशेष की पोषक बन गयी हैं।
इस योजना पर व्यय होने वाली राशि का भी वही होना है जो पिछली योजना राशियों का हुआ। इस याजना में भी वही घिसी-पिटी और थका देने वाली योजनाओं पर जोर दिया गया है, जिससे न तो जनता को प्रत्यक्ष रूप से कोई लाभ मिल पाता है और न विकास का कोई चमत्कार। हां यह योजनायें सरकारी आंकड़ों मे वृद्धि अवश्य करते हैं। इन योजनाओं के नाम पर जो बंदरबांट और विकास का दिवास्वप्न जनता को दिखाया जाता रहा है, उससे जनता पहले ही त्रस्त है। राज्य बनने के बाद से उर्जा प्रदेश का राग अलापने वाली सरकारें अभी तक गांवों में बिजली नहीं पहुंचा पायी है। जहां पहुंची भी है तो वहां घंटों की कटौती ने परेशान किया है। असल में जिस तरह स्वयंसेवी संस्थायें समस्याओं का हैव्वा खड़ा कर पैसा ऐंठती हैं वही चरित्र सरकारों का भी है। विकास के नाम पर ठगी और जनता को गुमराह कर पैसे का अपव्यय।
राज्य में जहां तक जनता की मूलभूत समस्याओं के समाधान का सवाल है, इस एक दशक में सरकारों ने इसमें कोई दिलचस्पी नहीं दिखायी है। सरकारी अस्पतालों की हालत दिन-प्रति-दिन बिगड़ती जा रही है। उसकी जगह पर एनजीओं को लाभ पहुंचाने के लिये 108 सेवा शुरू कर स्वास्थ्य के ढ़ाचागत स्वरूप को खत्म कर इसे निजी हाथो में सौंपने की जमीन तैयार की जा रही है। सरकार निजी चिकित्सालयों और मेडिकल कालेजों को प्रोत्साहन दे रही है। सुना है कि अब शिक्षा भी मोबाइल स्कूलों के माध्यम से दी जायेगी। इसका सीधा अर्थ है सरकारी व्यवस्थाओं को नकारा साबित कर निजी क्षेत्र के लिये रास्ता खोलना। कल्याणकारी योजनाओं पर सबसे ज्यादा खर्च इसलिये दिखाया जाता है ताकि एनजीओ को पोषित किया जाय। राष्टीय समाचार पत्रों में हर वर्ष मुख्यमंत्री का योजना आयोग के उपाध्यक्ष के साथ भेट और उन्हें गुलदस्ता भेट करना सत्तारूढ़ पार्टियों को भले ही सुकून देता हो, लेकिन राज्य में पसरी वित्तीय अनियमिततायें जनता को मुंह चिढ़ा रही हैं। योजना मदों की प्राथमिकताओं की बात इसलिये जरूरी है क्योंकि राज्य बनने स पहले भी यहां पर्वतीय विकास मद से मिलने वाली राशि पर नहीं उसके खर्च करने के तरीके पर असंतोष था। पर्वतीय विकास मद में मिलने वाले 650 करोड रुपये की जो बंदरबांट होती थी, उससे पहाड़ का विकास तो नहीं हो पाया नौकरशाहों और राजनीतिज्ञों की जेबें मजबूत हुयी। कमोवेश राज्य बनने के इन सालों में भी स्थिति वही है। शुरुआत में भाजपा की नौसिखया और पूर्वाग्रही अंतरिम सरकार ने शिशु मंदिरों के पोषण को विकास मान लिया और बाद में कांग्रेस ने विकास का जो नया चरित्र ईजाद किया वह सबके सामने आया। सुविधाभोगी राजनीति को आगे बढ़ाते हुये राज्य में संसाधनों की लूट जारी है। निशंक जी धन्य हैं, इस ज्यादा ठग लाये।
उत्तराखण्ड का दुर्भाग्य यह रहा कि केन्द्र से खैरात मांग कर ले जाना ही मुख्यमंत्रियों की उपलब्धि बनता रहा। क्या कोई मुख्यमंत्री यह भी करने का साहस कभी रख पायेगा कि अपने संसाधनों से, अपनी आय से अपने राज्य के लिये एक वर्ष का बजट पेश कर सके?