मेरे मोबाइल पर एक मैसेज आया कि उत्तराखण्ड भारत का एक ऐसा राज्य है, जहां के लोग हर दो घंटे में खुशियां मनाते हैं। कैसे…..? लाइट आई ! लाइट आई!! यह हम लोगों भले ही चुटकुला लगे लेकिन यह उतना ही सच है जितना व्यंग्य का मर्म। उर्जा प्रदेश में बिजली मिलने की खुशी ही नहीं प्रदेश को एक ऐसा मुख्यमंतत्री भी मिला है जो अंधेरे को अपनी उपलब्धियों में शुमार करना चाहते हैं। ऐसा मुख्यमंत्री जो अपनी कविताओं और पुरस्कारों से उत्तराखण्ड का चमत्कृत कर देना चाहते हैं। उन्हें पुरस्कार चाहिये, सिर्फ पुरस्कार। असल में छदम राष्टभक्तों की एक बड़ी फेरहिस्त रही है जो आम लोगों के सवालों को अपनी लफ्फजियों में उलझाते रहे हैं। इस समय उत्तराखण्ड की सत्ता में स्वयंभू राष्ट्र भक्त और उनके भाट-चारणों की एक लंबी जमात खड़ी हो गयी है। जिस तरह कभी बिहार की राजनीति में मसखरों की टोलियां सत्ता के गलियारों में घूमा करती थी ऐसी स्थिति आज उत्तराखण्ड की है। बिहार में सपेरों से लेकर लालू चालीसा बनाने वाले मंत्रिमंडल में शामिल रहे हैं। उत्तराखण्ड में सपेरे तो नहीं हैं लेकिन मुख्यमंत्री निशंक ने अपनी मसखरी से जो राजनीतिक धारा को ईजाद किया है उससे कभी निशंक चालीसा लिखने वाले लोग जरूर दिखाई देंगे। राज्य के किसी शहर में यदि निशंक को राष्ट्रकवि बताने वाले होर्डिग और पोस्टर दिखाई दें तो किसी को आश्चर्य नहीं करना चाहिये।
मुख्यमंत्री निशंक इन दिनों एक अभियान चलाये हैं कि महाकुंभ के सफल संचालन के लिये इन्हें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया जाना चाहिये। उन्होंने ऐसे समय में यह मांग की है जब कुंभ में हुयी दुर्घटना में कई लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा और कई लोग अपने परिजनों को खोज रहे हैं। असल में निशंक के लिये यह नई बात नहीं है। इससे पहले उन्होने 108 सेवा को भी गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में शामिल करने की बात कही थी। उसमें उन्होंने तर्क दिया था कि इस आपातकालीन सेवा से एक साल में ही करीब आठ सौ से अधिक महिलाओं ने जन्म दिया। ऐसी बेहुदी मांगों और ढौंग के सहारे ही उन्होंने अपनी राजनीति का सफर तय किया है। उनके गृह जनपद पौड़ी में किसी चारण ने उन्हें रा्ष्ट्रकवि से नवाजा है तो एक प्राफेसर साहब उन्हें सबसे बड़ा राष्ट्रभक्त साबित करने के लिये पुस्तिका छाप चुके हैं। रमेश पोखरियाल निशंक को कवितायें करने का शौक रहा है। स्कूल की पत्रिकाओं के स्तर की इन कविताओं के वे कई संग्रह भी निकाल चुके हैं। जब वे स्वास्थ्य मंत्री थे तब एक महंगे कागज पर उन्होंने अपनी पुस्तकों और सम्मानों का सचित्र विवरण प्रकाशित कर बताया कि वे एक पहुंचे हुये कवि हैं। लोगों को समझने में सुविधा हो इसके लिये उन्होंने प्रत्येक राष्टपति, प्रधानमंत्री से लेकर फिल्मी नायक-नायिकाओं के साथ अपने फोटो भी प्रकाशित किये। उसी पुस्तिका से पता चला कि उनके साहित्य पर लगभग आठ छात्र शोध कर रहे हैं। उनके कई कविता संग्रहों का विदेशी और भारतीय भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। जर्मनी के विश्वविद्यालयों में उनकी रचनायें पाठ्यक्रम में लगाई गयी हैं। मॉरिशस और श्रीलंका में उन्हें साहित्य की सेवा के लिये सम्मान के साथ डीलिट की मानद उपाधि दी गयी। इसके अलावा भी बहुत सारी जानकारियां इस पुस्तिका में हैं जो किसी भी कार्यक्रम के शुरू होने से पहले सभास्थल पर बंटवाई जाती रही हैं। आप हिन्दी साहित्य के छात्र हों और हिन्दी साहित्य में कहीं निशंक का नाम न मिले तो आप इस पुस्तिका से और विदेशी विश्विद्यालयों से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। यह पूरा प्रचार तंत्र वैसा ही जैसा एक गुप्तरोग विशेषज्ञ अपनी तारीफ में अखबार के पहले पृष्ठ पर राष्ट्रपति से पुरस्कार लेते फोटो प्रकाशित करता है। उसकी डिग्रियां ऐसी होती हैं जिनका किसी ने नाम भी नहीं चुना होता है।
खैर कवितायें लिखना और उन्हें अपने तरीके से प्रचारित करने का पूरा अधिकार निशंक जी को है। उनके पुरस्कारों से किसी को ईर्ष्या भी नहीं होनी चाहिये। पुरस्कार ऐसे ही मिलते हैं। इनमें किसी योगदान का कोई महत्व नहीं होता। अगर होता तो पहाड़ से हिन्दी साहित्य में एक से एक धुरंधर साहित्यकार हुये उन्हें खाने तक के लाले पड़े। शैलेश मटियानी को जीवन भर संघर्ष करना पड़ा। चंद्रकुंवर बर्त्वाल को अपनी बीमारी से अलकनंदा के तट पर अपना जीवन त्यागना पड़ा। मौजूदा समय में हिन्दी साहित्य में कई बड़े नाम बड़ी उम्र में भी नौकरियां कर अपने को जीवित रखे हुये हैं। उनकी रचनाओं का न दो इतनी भाषाओं में अनुवाद हुआ, न विदेशी विश्वविद्यालयों के पाठयक्रमों में लगायी गयी, न ही इतने लोगों ने उन पर शोध किया और न ही किसी ने उन्हें राष्टकवि के खिताब से नवाजा। हमें ‘राष्टकवि’ निशंक को देश के अब तक के ‘श्रेष्ठ मुख्यमंत्री’ के रूप में नोबेल पुरस्कार देने की सिफारिश करनी चाहिये। यह इसलिये भी जरूरी है कि उत्तराखण्ड के लोगों को ही दो घंटे में खुशी चाहिये। बिजली आयी! आयी!!
[...] हमारे मुख्यमंत्री साहित्यकार भी हैं उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद से उनकी रचनाधर्मिता में अद्भुत् इजाफा हुआ है। उनकी कई पुस्तकें भी मुख्यमंत्री बनने के बाद से प्रकाशित हुई हैं। जिनमें उपन्यास, कविता, कहानियाँ शामिल हैं। कई पत्रिकाएँ इन साहित्यकृतियों की तारीफ करती समीक्षाएँ छाप चुकी हैं। गढ़वाल और कुमाऊँ विश्वविद्यालय के कई शोध छात्र निशंक की सृजनयात्रा पर शोधरत हो गये हैं। शायद वे अपने शोध में तलाश पायें कि ‘निशंक’ की कौन सी रचना कालजयी है कि उसे नोबेल मिल जाये। आखिर ‘कुंभ’ मेले के लिए तो इन्हें नोबेल पुर… [...]