उत्तराखंड में एक लोकोक्ति प्रचलित है-“भलि छे सुवा भली छे, भलि बतौनि भलि हे, जस छे सुवा उसि छे।” इसका अर्थ है सुन्दरी की प्रसंशा करते हुये हमेशा कहा जाता रहा कि तू बहुत अच्छी है, सभी बताते हैं वह अच्छी है, लेकिन अपनी जैसी ही है। यह बात उत्तराखंड राज्य के दस वर्ष पूरे होने पर सटीक बैठती है। वह वैसा ही जैसा है। पिछले कुछ सालों में एक उम्मीद जग रही थी कि आने वाले दिनों में शहीदों ने जिस राज्य का सपना देखा था शायद वह समय के साथ साकार हो जायेगा। लेकिन पिछले दो-तीन वर्षों में भाजपा-उक्रांद गंठबंधन सरकार ने इस राज्य को भष्ट्राचार और लूट का जो नया उपनिवेश बनाया है उससे अब लोगों की रही-सही उम्मीदें भी टूट गयी है। तमाम सवाल न केवल अपनी जगह खड़े हैं, बल्कि और भयानक रूप से जनता के सामने खड़े हो गये हैं। इस इस साल की जब लोग समीक्षा कर रहे हैं तब प्रदेश भारी प्राकृतिक आपदा की मार से उबरने की छटपटाहट में है। इस आपदा ने यह बताया कि इन दस वर्षों में अनियोजित विकास और मुनाफाखोरों में हाथों में अपनी जल, जंगल और जमीनें सौंपकर राज्य के नीति नियंताओं ने मानवजनित आपदा का रास्ता तैयार किया है। सही मायने में राज्य का यह पहला दशक हमें डराता है। आकांक्षायें की बात तो छोड़िये अब यह पहाड़ के अस्तित्व को नेस्तनाबूत करने का दशक रहा है।
असल में राज्य के लोगों की आकांक्षाओं का यह राज्य बना ही नहीं। उत्तराखंड राज्य आंदोलन को वर्ष 1994 का आंदोलन मानना सबसे बड़ी भूल है। इस आंदोलन से हम लोगों की आकांक्षाओं को नहीं समझ सकते। इसे समझने के लिये हमें उन मूल बातों की ओर जाना होगा जहां से राज्य की बात शुरू हुयी थी। आजादी के आन्दोलन के समय से ही यहां के लोगों में प्राकृतिक संसाध्नों पर हक की बात को प्रमुखता से उठाया था। राष्टीय आंदोलन मे यहां के लोगों की भागीदारी इसी रूप में हुयी। सालम, सल्ट, तिलाड़ी की क्रान्तियां इसी आकांक्षाओं का प्रतीक थी। आजादी के बाद भी जंगलात कानून अंग्रेजों के समय के रहे। लोगों को लगा कि अब भी उनके हक उनसे छीने जा रहे हैं। सत्तर के दशक में इसके प्रतिकार के रूप में जनता आगे आयी। पहाड़ के तमाम जंगल तीस साला एग्रीमेंट पर स्टार पेपर मिल और बिजौरिया को सौंपे जाने लगे इससे लोगों में असंतोष उभरा। आंदोलनों का नया सिलसिला चला। वन बचाओ, चिपको, नशा नहीं दो रोजगार, तराई में भूमिहीनों को जमीन दिलाने का आंदोलन और वन अधिनियम के खिलाफ आंदोलन जनआकांक्षाओं के पड़ाव रहे हैं। बाद में लोगों ने इन तमाम समस्याओं का समाधान अलग राज्य के रूप में देखा। तीस साल तक अनवरत चले आंदोलन में जनाकांक्षायें इन्हीं मुद्दों में इर्द-गिर्द रही। वर्ष 1994 में जब आंदोलन चला तो यह जनाकांक्षाओं के बजाय भावनात्मक रूप में तब्दील हो गया। इस आंदोलन में एक अलग प्रशासनिक टुकड़े की मांग प्रभावी हो गयी। यही कारण के 42 शहादतों के बाद भी राज्य छह साल बाद मिला। इससे स्पष्ट होता है कि सत्ता में बैठे लोगों ने कभी भी जनता की भावनाओं को महत्व नही दिया। दुर्भाग्य से जब राज्य बना तो वह बारी-बारी से दो पहाड़ और राज्य विरोधी ताकतों के हाथों में चला गया। इससे इस बात पर कोई फर्क नहीं पड़ा कि हम उत्तर प्रदेश में हैं अपने राज्य में। पिछले दस साल की उठाकर देख लीजिये पहाड़ तेजी के साथ बिकने लगा है। सत्तर के दशक में बिजौरिया को जंगल बेचे जा रहे थे तब उत्तर प्रदेश में बैठे हुक्मरान इसके बिचौलिये थे अब थापर और जेपी को नदियां बेची जा रही हैं, उसको बेचने वाले अपने ही भगत, नारायण, खंडूडी और निशंक हैं। मुझे सबसे बुनियादी कारण यही लगता है कि हम अब भी जनाकांक्षाओं को परिभाषित नहीं कर पा रहे हैं जिसके मूल में यहां के संसाधनों पर स्थानीय लोगों के अधिकार की भावना निहित है।
भ्रष्टाचार उत्तराखंड का ही मसला नहीं है। यह एक राष्टव्यापी बात है। लेकिन उत्तराखंड में भ्रष्टाचार इतने बड़े पैमाने पर होगा यह किसी के आभास नहीं था। राज्य बनते ही जैसे इसे लूट का एशगाह बना दिया गया। उससे लोगों की उम्मीदें टूटी हैं। पहली अंतरिम सरकार भाजपा की बनी। उसने देहरादून में निर्माण कार्यो की झड़ी लगा दी। उसके पीछे भारी पैसा राजनीतिज्ञों और अफसरों की जेब भरने की नीयत रही। पहनी चुनी कांग्रेस, जिसकी अगुआई विकास पुरुष कर रहे थे उन्होंने सरकारी और गैर सरकारी तौर पर इसे सामाजिक मान्यता दे दी। लालबत्तियों से लेकर मुख्यमंत्री राहत कोष के दुरुपयोग का जो रास्ता तैयार हुआ वह आज तक जारी रहा। कांग्रेस के जमाने में भाजपा जिन 56 घोटालों की बात करती थी उसके जमाने में यह इतनी बढ़ी कि ॠषिकेश के जमीन घोटाले और जल विद्युत परियोजनाओं के आवंटन ने सारे रिकार्ड तोड़ दिये। सही तरह से राज्ये के घोटालों की जांच हो जाये तो यहां कई कोड़ा सामने आयेंगे। सत्तारूढ़ भाजपा पर लगे सारे आरोप इसलिये भी सही साबित हो रहे हैं, क्योकि जलविद्युत परियोजनाओं के आवंटन पर कोर्ट के फैसले के एक दिन पहले उसने सभी परियोजनाओं के आवंटन को यह कहकर रदद कर दिया कि खंडूडी सरकार के समय में विज्ञापन गलत था। खंडूडी ने इसका खंडन भी किया। इस समय उत्तराखंड देश के सबसे भ्रष्टतम राज्यों में से एक है। लोग हैरत में हैं। भाजपा एक क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टी के सहयोग से सरकार चला रही है। वह राजनीतिक पार्टी जिसने सपने जगाने का काम किया था। उस पार्टी के शीर्ष नेताओं को जिस तरह मौजूद मुख्यमंत्री ने सत्ता से ज्यादा संसाधनों से लैस किया है उससे इस राज्य में भ्रष्टाचार के कोढ़ में खाज का काम किया है। भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी इस सरकार की संवेदनहीनता को इसी बात से समझा जा सकता है कि जहां एक ओर आपदा प्रभावित लोग अभी भी रोजमर्रा की जरूरतों कें लिये तरस रहे हैं वहीं मुख्यमंत्री मीडिया और विपक्ष को मैनेज करने में लगे हैं। इन दस सालों में मैनेज करने की इस राजनीति ने राय को गर्त में डाल दिया।
इन वर्षों में राजधनी का मुद्दा भाजपा और कांग्रेस के लिये महत्वपूर्ण नहीं रहा है। वे हमेशा गैरसैंण को स्थाई राजधानी बनाने के खिलाफ रहे हैं। जब राज्य बना तो अंतरिम सरकार भाजपा की बनी। उस समय केन्द्र और उत्तर प्रदेश में भी भाजपा की ही सरकार थी। यदि वह चाहते तो स्थायी राजधानी की घोषणा कर सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया, बल्कि राजधानी के सवाल को उलझाने के लिये राजधानी स्थल चयन के लिये दीक्षित आयोग का गठन कर दिया। कांग्रेस के शासन में इस आयोग का कार्यकाल बढ़ा दिया गया। इसे नौ वर्षो में 11 बार बढ़ाया गया। बाद में जो रिपोर्ट विधानसभा पटल पर रखी गयी वह मूल रिपोर्ट नहीं, बल्कि एनेक्सर था। इसका विरोध भी हुआ। अभी तक यह रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुयी। बताया जाता है कि इस रिपोर्ट में भी गैरसैंण के पक्ष में सबसे अधिक मत हैं। सरकार इसे छुपाना चाहती हे। दुर्भाग्य से जिस उक्रांद ने गैरसैण को राजधानी बनाने की कसमें खायीं थी वह आज सत्ता सुख भोगने के लिये भाजपा के साथ गलबहियां कर रही है। इसलिये अभी देहरादून में सारे निर्माण कार्य हो रहे हैं। मुख्यमंत्री और राज्यपाल के भवन बन गये हैं। विधायक निवास तो पहले ही बन गया था। राष्टीय पार्टियां स्थायी राजधनी देहरादून बनाने के लिये पूरी तरह लगी है। उक्रांद अब उनके साथ है। इसलिये फिलहाल तो यह मामला सुलझता नहीं लग रहा है।
वैसे पूरा हिमालय बहुत बाद में बना पहाड़ है। मध्य हिमालय तो बहुत नाजुक है। यहं आने वाली प्राकृतिक आपदाये और भूस्खलन कोई नई बात नहीं है। इसके लिये समय-समय पर विभिन्न रिपोर्टो ने चेताया भी है। जैसा कि आपने आंकड़ा दिया है कि 6800 गांवों को अपादा की संवेदनशीलता को देखते हुये खाली करने की जरूरत है। सरकारों के लिये यह प्राथमिकता कभी नहीं रही। उत्तराखंड देश का एकमात्रा राज्य है जहां आपदा का अलग मंत्रालय और विभाग है। इसमें प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। असल में नीति-नियंताओं को अभी पहाड़ की समझ नहीं है। राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में वे ऐसी किसी रिपोर्ट को महत्व नहीं देते हैं जिससे मानवहानि और भूगर्भीय खतरों की हानि होती है। यह बात बिल्कुल सही है कि आपदाओं से निपटने में सरकार बुरी तरह विफल रही है। मेरी समझ से पिछले दिनों राज्य में जो आपद आयी वह प्राकृतिक कम मानवजनित ज्यादा है। इसमें सरकार की नीतियां सबसे ज्यादा दोषी हैं। आजादी के बाद पहाड़ में विकास का कोई ऐसा ढ़ांचा विकसित नहीं हुआ जो ऐसी आपदाओं को रोकने में कामयाब हो सके। 19 अगस्त को सुमगढ़ में शिशु मंदिर के 18 बच्चों की मौत का कारण सौंग में सरयू पर बने रही जलविद्युत परियोजना की सुरंग रही है। इसके विरोध् में ग्रामीणों ने लंबा आंदोलन चलाया था। लेकिन जनप्रतिनिधि कंपनी के पक्ष में खड़े हो गये। भूगर्भीय सर्वेक्षण में कपकोट के जिन 20 गांवों को आपदा संवेदनशील चिन्हित किया गया था उसमें सुमगढ़ नहीं था। उसका सबसे कड़ा कारण यह था कि यदि यह गांव उसमें शामिल होता तो बांध् के लिये गांव के पास से सुरंग नहीं बनती। इस हादसे यह सबसे बड़ा कारण था। अल्मोड़ा, उत्तरकाशी, चमोली, पिथौरागढ़ जैसे संवेदनशील जिलों के अतिरिक्त तराई में प्रतिवर्ष आने वाली प्राकृतिक आपदाओं और उनसे प्रभावित होने वाले परिवारों के लिये सरकार के पास कोई व्यवस्था नहीं है। सरकार ने अभी तक कोई ऐसा भौगोलिक और भूगर्भीय आधार तैयार नहीं किया है जिससे लोगों के मकान और सरकारी भवनों को बनाने के जमीन का सही चयन हो सके। यही कारण है कि इस बार की आपदा में सबसे ज्यादा नुकसान सरकारी भवनों और गांव-शहर के कमजोर वर्गों को हुआ है। सरकार को भूगर्भीय खतरों के निशाने पर रहे गांवों के पुनर्वास की कभी चिन्ता नहीं रही। आपदा के नाम पर राज्य सरकार जहां एक ओर भारी पैसे की मांग केन्द्र सरकार से कर रही है, वहीं मुख्यमंत्री लाखों रुपये के विज्ञापनों के माध्यम से अपनी उपलब्धियों को बताने मे लगे हैं।
असल में उत्तराखंड राज्य की मांग के पीछे यहां से होता पलायन मुख्य रहा है। आजादी के बाद लोग रोटी-रोजी के लिये यहां से बाहर निकलने लगे। सरकार के विकास और युवाओं को रोजगार से जोड़ने के तमाम दावे खोखले साबित होते रहे हैं। लोगों को लगता था कि अपना राज्य होगा तो यहां की परिस्थितियों के अनुरूप नीतियां बनेंगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि ‘पहाड़ का पानी और जवानी पहाड़ के काम नहीं आती’ मुहावरा इन दस सालों में और भयावह रूप से हमारे सामने आया है। सिर्फ सरकारी आंकड़ों को ही देखें तो आजादी के 63 सालों में यहां ये लगभग 43 लाख लोगों ने स्थायी रूप से अपना घर छोड़ा। राय बनने के दस सालों में में ही लगभग 23 लाख लोग स्थायी रूप से पहाड़ छोड़ चुके हैं। पौने दो लाख घरों में ताले पड़ चुके हैं इससे आप राज्य बनने के बाद सरकारों की नाकामी को समझ सकते हैं। परिसीमन पर पहाड़ के दस पर्वतीय जिलों से छह विधनसभा सीटों का तीन मैदानी जिलों में समाहित होना इस बात को प्रमाणित करता है कि राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में जनसंख्या लगातार घट रही है। रोजगार सृजन तो इन दस सालों में नहीं हुआ, लेकिन भारी संख्या में नौकरियों में कटौती हुयी। उद्यान विभाग मे पदों पर रोक लगी। राज्य में फार्मासिस्टों की भारी कमी है। अठारह सौ पद रिक्त होने के बाद भी प्रशिक्षित फार्मासिस्टों को नौकरी पर नहीं रखा जा रहा है। पिछले दिनों सरकार ने लंबे समय से लंबित पड़े शिक्षकों की भर्ती को बहा किया लेकिन इनमें जो शर्ते रखी गयी हैं वे प्रशिक्षित बेरोजगारों को और मुश्किल में डालने वाली हैं। अब बीएड, डीपीएड और अन्य प्रशिक्षण प्राप्त लोगों को प्रवेश परीक्षा देनी होगी। वन विभाग में वर्षो से हजारों श्रमिक दैनिक वेतन पर काम कर रहे हैं, उन्हें स्थायी करने की दिशा में कोई काम नहीं हुआ है। सरकारों ने कहा कि तराई में सिडकुल स्थापित कर राय के सत्तर प्रतिशत लोगों को रोजगार देंगे, लेकिन वहां जिस तरह पूंजीपतियों के हितों के लिये ठेकेदारी प्रथा पर काम किया जा रहा है सरकारों की मंशा को साफ करता है।
सिडकुल में श्रम कानून की धज्जियां उड़ना नई बात नहीं है। उत्तर प्रदेश के समय में उत्तराखंड में उद्योग लगाने के नाम पर काशीपुर, रुद्रपुर, खटीमा और भीमताल को ओद्यौगिक विकास के लिये चुना गया। इन उद्योगों को लगाने के लिये सरकार ने जो नीति अपनाई वह यहां के लोगों के लिये अभिशाप साबित हुयी। सब्सिडी पर उद्योगपतियों को बुलाकर लोगों को सोना उगलने वाली जमीन औने-पौने दामों पर उद्योगपतियों के हवाले की गयी। ये उद्योग पांच-छह साल में सब्सिडी डकार कर अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर चलते बने। युवाओं को रोजगार तो दूर भीमताल जैसे जगहों में भू-उपयोग बदलकर उसमें अय्याशी के अडडे बना दिये गये। काशीपुर मे अस्सी प्रतिशत उद्योग बंद हुये जो अस्सी के दशक में स्थापित किये गये थे। राज्य बनने के बाद सिडकुल के स्थापित करने के लिये सरकार ने जिस तरह की जनविरोधी और श्रमिक विरोध् तरीकों का इस्तेमाल शुरू से किया उसके दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं। यहां सब्सिड़ी पर लगे उद्योग एक तरफ तो भागने की तैयारी में हैं दूसरी ओर श्रमिकों के शोषण का यह नया टापू बन गया है। वर्ष 1987 में स्थापित और मुनाफा कमाने वाली होंडा में श्रमिकों के खिलापफ लिया गया फैसला तो है ही, भास्कर और अन्य कंपनियों ने भी श्रमिक शोषण में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। यहां श्रमिक कानूनों का उल्लंघन इस बात से साबित होता है विभिन्न उद्योगों में अब तक 133 श्रमिक अपने हाथ-पांव गंवा चुके हैं। उन्हें सरकार या प्रबंधन की ओर से न तो मुआवजा मिला और न उनके पुनर्वास की कोई व्यवस्था है। हर सरकार कहती है कि यहां स्थानीय लोगों को सत्तर प्रतिशत आरक्षण दिया गया है लेकिन यह झूठ है। उदाहरण के लिये टाटा मोटर्स को लें। इस कंपनी के यहां 86 वेंडर हैं। इनमें श्रमिकों का ठेके पर रखा जाता है। किसी प्रकार की दुर्घटना होने पर कोई क्लेम नहीं हो पाता है। ठेका प्रथा होने से खतरनाक श्रेणी में आने वाले उद्योगों में भी अप्रशिक्षित लोग काम करते हैं, इससे अक्सर दुर्घटनायें होती हैं। श्रमिकों का कम वेतन और उनसे बहुत अधिक काम लिये जाने की बात आम हो गयी है। श्रमिक शोषण के खिलाफ जब भी कोई आवाज उठती है, सरकार उन्हें माओवादी कहकर राष्ट्रद्रोह की धाराओं में अन्दर करने में भी कोई कसर नहीं करती। अब सरकार और कंपनी मालिकों के लिये श्रमिक कानून बहुत मायने नहीं रखते हैं।
जब से राज्य बना है इसके विकास की जगह नेता इसी बात पर लगे रहे कि किस रास्ते से वह सबसे अधिक पैसा कमा सकते हैं। उद्योगों के लिये जमीनें दिलवाने या किसी रूप में उस पर साझीदारी रखने के बहुत सारे मामले राज्य में हैं। पिछले दिनों ॠषिकेश में भूमि घोटाले ने उद्योगों की जमीन का बेशर्मी के साथ भू-उपयोग बदलने का मामला सामने आया। इसमें भाजपा-कांग्रेस दोनों दलों के नेताओं की संलिप्तता रही है। राजनीतिक पार्टियां इस दलदल में कितनी अंदर तक धंसी हैं इसका पता इस बात से चलता है कि विधायक-मंत्रियों की बात तो छोड़िये मुख्यमंत्री और विपक्ष के नेता भी इसमें शामिल हैं। यह उत्तराखंड में उद्योगों के नाम पर जमीनों पर राजनीतिज्ञों की संलिप्तता साफ करती है। उत्तराखंड में विनाशकारी विकास के माडल और दैयात्याकार बांधों से पहाड़ दरक रहे हैं। जैसा मैंने पहले भी कहा प्राकृतिक संसाधनों को मुनाफाखोरों के हाथों सौंपा जा रहा है। बांधों के संदर्भ में यह बात और खतरनाक तरीेके से सामने आया है। पहाड में इस समय विभिन्न नदियों में 558 बांध प्रस्तावित हैं। इन बांधों में से पंद्रह सौ किलोमीटर सुरगें निकलनी हैं। यदि ऐसा होता है तो यहां की 28 लाख की आबादी इन सुरंगों के उपर होगी। चमोली जनपद के अलकनन्दा पर बनी बांध परियोजनाओं ने वहां की आबादी को आतंकित कर रखा है। बिष्णुगाड़ परियोजना से निकलने वाली सुरंग की लंबाई ग्यारह किलोमीटर है। जहां यह सुरंग समाप्त होती है वहां चाई गांव के नीचे बने पावरहाउस से चाईं गांव धंस गया है। चमोली जनपद में बांध की सुरंगों के कारण अभी तक छह गांव नेस्तनाबूत हो चुके हैं। 38 गांव ऐसे हैं जिन्हे भारी खतरा है। तपोवन-बिष्णुगाड़ परियोजना से ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक शहर जोशीमठ खतरे में है। इसके नीचे से निकल रही सुरंग से पानी रिसने से लोग दहशत में हैं। इस परियोजना के बारे में पर्यावरणीय खतरों को भी सरकार ने दरकिनार कर दिया। इस घाटी में ऐसे ही पांच और बांध् बन हैं। श्रीनगर में बन रहे बांध् की उंचाई और झील की लंबई बढ़ने से कई तरह के खतरे पैदा हो गये हैं। यहां लोगों की आस्था का धरी देवी मंदिर डुबाने की साजिश हो गयी है। बागेश्वर जनपद में सरयू नदी पर सौंग में बनने वाली बांध की सुरंग ने सुमगढ़ के एक स्कूल के 18 बच्चों का मौत की नींद सुला दिया। इस तरह के खतरों को सरकार नहीं देखती। उसे बस जेपी और थापर के मुनाफे की चिन्ता है। जहां तक प्रो. जी डी अग्रवाल के आंदोलन का सवाल है, वह विश्व हिन्दू परिषद के एजेंट के रूप में काम कर रहे हैं। गंगा सिर्फ आमचन के लिये ही नहीं है। गंगा को आस्था के नाम पर बचाने की मूर्खतापूर्ण बातें पहाड़ के लिये खतरनाक हैं।
लोहारीनागपाला परियोजना को सरकार यदि आस्था के सवाल पर बंद किया है तो यह जनविरोधी फैसला है। सरकार को इस बात को स्पष्ट करना चाहिये। यह इसलिये जरूरी है क्योंकि लोहारी नागपाला बांध् बनने से वहां भूगर्भीय और पर्यावरणीय खतरे बढ़े हैं। इससे प्रभावित 19 गांव भूस्खलन और निर्माण कार्य से होने वाले धमाकों से खतरे में हैं। यहां घरों में दरारें आ गयी हैं। गंगा को 113 किलोमीटर तक पवित्र रखने का अभियान पहाड़ के चालीस साल से चल रहे बांध् विरोध् आंदोलन को कमजोर करने की साजिश है। हमारा मानना है कि गंगा का अस्तित्व तभी है जब लोग रहेंगे। गांवों को खत्म होने और गंगा को बचाने की मूर्खता प्रो. अग्रवाल ही कर सकते हैं। पहाड़ की सभी नदियां गंगा हैं। सभी नदियों पर बनने वाले बांध् बंद होने चाहिये। रन आफ दि रीवर और छोटे बांधों के नाम पर यह छलावा जल्दी बंद होना चाहिये। असल में एक मापदंड बना दिया गया है कि टिहरी बांध् बड़ा है बाकी सब छोटे हैं। वास्तव में उत्तराखंड में बन रहे सभी बांध बड़े और खतरनाक हैं। बिजली प्रदेश बनाने की राजनीति लोगों का डुबाने और मुनाफाखोरों के काम आ रही है।
namaskar
will reply very soon thanks,
k.s.bangari