कुछ माह पहले उत्तराखण्ड क्रान्ति दल का बहुप्रतीक्षित द्विवार्षिक सम्मलेन भारी हंगामे के बाद समाप्त हुआ। नैनीताल जनपद के पीरुमद्वारा के एक बैंक्वट हाल में सत्ता की धमक और कार्यकर्ताओं की उपेक्षा का जो खेल कथित नेतृत्व ने खेला उसे दूर-दराज से आये कार्यकर्ताओं में भारी मायूसी छाई रही। कार्यकर्ताओं की सरकार से समर्थन की वापसी की बात को नेताओं ने नहीं सुना। इतना ही नहीं दो साल में होने वाले कार्यकर्ताओं के इस आम जलसे में पार्टी ने यह संदेश भी दिया कि अब वह जनसरोकारों से काफी दूर जा चुकी है, जहां से उसका लौटना अब संभव नहीं है। इस दो दिन के सम्मेलन में मुददों की जगह जिस तरह नेताओं ने अपने अंह से अध्यक्ष के चुनाव को टाला उससे एक आंदोलनकारी संगठन के लोकतांत्रिक स्वरूप पर भी सवाल खड़े कर दिये हैं। चालीस प्रस्ताव पारित कर जिस तरह इस सम्मेलन की खानापूर्ति हुयी उससे क्षेत्रीय पार्टी की कमजोर राजनीतिक समझ ही परिलक्षित होती है। दो दिनों तक हंगामे के अलावा इस सम्मेलन की उपलब्धि शून्य रही।
उल्लेखनीय है कि कभी राज्य आंदोलन की अगुवाई करने वाले उत्तराखण्ड क्रान्ति दल ने अपनी विचारधारा के विपरीत प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को समर्थन दिया। दल के जमीनी कार्यकर्ताओं ने इस समर्थन का विरोध किया था, लेकिन पार्टी के कथित सर्वोच्च निर्णायक मंडल ने देहरादून में बैठकर कार्यकर्ताओं की भावनाओं के खिलाफ सरकार को समर्थन दिया। इन तीन सालों में विभिन्न बैठकों और अपने बयानों में पार्टी का एक बड़ा तबका इसके खिलाफ लड़ाई लड़ता रहा। भाजपा ने दल के एक विधायक को केबिनेट मंत्री और दो को लालबत्ती से नबाजा। पार्टी के शीर्ष नेता माने जाने वाले काशी सिंह ऐरी ने भी संबसे कम महत्व के हिल्टान जैसे विभाग का अध्यक्ष बनना स्वीकार किया। संगठन और नेताओं के बीच यह विरोध लगातार जारी रहा। पिछले मसूरी सम्मेलन में भी सरकार से समर्थन वापसी का मुद~दा छाया रहा, लेकिन कार्यकर्ताओं की बात सुनने वाला कोई नहीं था। इन तीन वर्षों में भाजपा ने अपने सहयोगी पार्टी को महत्वहीन बनाकर कहीं का नहीं छोड़ा। एक तरफ जहां पार्टी के नेता देहरादून में सत्ता सुख भोगने में लगे रहे वहीं कार्यकर्ता गांवों में लोगों के सवालों से जूझते रहे। कार्यकर्ताओं को इस सम्मेलन का इंतजार था। वे चाहते थे कि 2012 में होने वाले विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुये सरकार से तुरंत समर्थन वापस लिया जाना चाहिये। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अध्यक्ष पद के लिये जिस तरह की औछी राजनीति हुयी उसने पार्टी की रही-सही साख पर भी बट~टा लगा दिया।
पार्टी के कार्यकर्ताओं के अलावा उत्तराखण्ड क्रान्ति दल का यह सम्मेलन उन तमाम शक्तियों के लिये भी निराशा भरा रहा जो राज्य के आमजन से उठे सवालों को एक मंच से उठाने की पैरवी करता रहा है। वह मानता रहा है कि बिना उक्रांद के किसी तीसरे गठबंधन की परिकल्पना नहीं की जा सकती है। सबको इस बात का भी इंतजार था कि देर से ही सही आंदोलन की ध्वजवाहक रही इस पार्टी के नेताओं को अक्ल आयेगी। लेकिन इस बार बिल्कुल उल्टा हुआ। पार्टी में जिस तरह कार्यकर्ताओं की लोकतांत्रिक अपेक्षाओं का गला घोंटा उसने राज्य में क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के प्रति लोगों के जनविश्वास को और कमजोर किया है। उक्रांद भाजपा से समर्थन के जिन नौ बिन्दुओं की बात करता रहा है, उससे कोई भी सहमत नहीं हो सकता है। इस समर्थन पर सवालिया निशान लगाने वाला सबसे बड़ा मुददा स्थाई राजधानी गैरसैंण है। इस सरकार के साथ रहते हुये दीक्षित आयोग का कार्यकाल दो बार बढ़ा, जिसे पार्टी हमेशा असंवैधानिक मानती रही है। आश्चर्यजनक बात यह है कि जब सदन में इस आयोग की रिपोर्ट गयी तो पार्टी की ओर से इस पर कोई ठोस प्रतिकार नहीं किया गया। पार्टी के युवा विधायक पुष्पेश त्रिपाठी ने आयोग की रिपोर्ट को सदन में ही फाड़ दिया था, लेकिन पार्टी के मंत्री ने इसे उनका व्यक्तिगत नजरिया कहकर कमजोर कर दिया। पार्टी के शीर्ष नेता भाजपा के जिला स्तर के नेताओं के सामने भी गिड़गिड़ाते रहे। सरकार के साथ गलबहियां करते जहां एक ओर भाजपा की कृपा से पद पाने और कहीं समारोहों में एक सीट पाने जैसी छोटी आंकाक्षाओं के चलते इस पार्टी के इतिहास बनने का रास्ता तैयार किया।
असल में उक्रांद में राजनीतिक समझ का भारी अभाव रहा है। संगठन में पिछले तीन-चार वर्षों से जिस तरह के लोग और जिस तरह की प्रवृतियों ने घुसपैठ की है उसने कभी जनसरोकारों के लिये खड़ी एक बड़ी जमात के सपनों को न केवल कुचला है बल्कि आने वाली स्वस्थ राजनीतिक समझ वाले लोगों के रास्ते को भी रोका है। झोला लटकाकर और चंदा कर सम्मेलनों में ओने वालों की जगह बड़ी गाड़ियों ने ले ली है। सैकडों कारों में उत्तराखण्ड कान्ति दल के पदाधिकारियों के चमचमाते बोर्ड हैं। रहने के लिये रेस्ट हाउस और रिसोर्ट हैं। देहरादून में बैठकर लाइजिंनिग करने वाला का एक नया वर्ग पैदा हुआ। जिला पंचायत के हाल में दरी में बैठकर राज्य बनाने और उसे संवारने की चिंता करने वालों की जगह बैंकट हाल और नेताओं के बैठने के लिये धुली चादरों का मंच है। ऐसे में आम कार्यकर्ता की हैसियत क्या होगी यह सहजता से समझा जा सकता है। रामनगर में संपन्न इस सम्मेलन का कुल संदेश यही था। तीस साल पहले एक बड़े उददेश्य और बेहतर राज्य का सपना देखने वाले लोगों ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि उनकी विरासत ऐसे लोगों के हाथों में चली जायेगी जो उसे नोंच-नोंच कर खा जायेंगे। उत्तराखण्ड क्रान्ति दल की दुर्गति किसी काशी सिंह ऐरी या दिवाकर भटट के सत्ता सुख से उपजी पतन की कहानी नहीं, बल्कि उन लोगों की असहय पीड़ा है जिन्होंने तीन दशक तक अपना सबकुछ त्याग कर एक बेहतर राज्य का सपना देखा था। इसी पीड़ा की अभिव्यक्ति के लिये पुराने कार्यकर्ता इस सम्मेलन में गये थे, लेकिन यहां सत्ता जीत गयी और उक्रांद हार गया। अब कौन रोयेगे उक्रांद के लिये।


उक्रांद से उत्तराखण्ड की जनता को काफी उम्मीदें थीं, लेकिन कुछ इनकी कार्यशैली, राजनीतिक हड़बड़ाहट, उतावलापन और नेताओं की फौज और कुछ संसाधनों की कमी के चलते इन्हें विधानसभा में अपेक्षित प्रतिनिधित्व नहीं मिला। लेकिन आज भी बुद्धिजीवी, समाजवादी, आन्दोलनकारी लोगों को इनसे बहुत अपेक्षा करती है। लेकिन यह लोग मंत्री पद और लालबत्तियों के मोह में ऐसे फंसे हैं कि निकल ही नहीं पा रहे हैं।