उत्तराखण्ड शासन में हमारे एक मित्र हैं नन्द किशोर शर्मा। पिछले कुछ दिन पहले तक वे रुद्रप्रयाग में जिला समाज कल्याण अधिकारी थे। पारिवारिक कारणों से लंबी छुट्टी में चले गये। फिलहाल हल्द्वानी स्थित समाज कल्याण महानिदेशालय में तैनात हैं। शर्मा जी का जिक्र इस कॉलम में अटपटा लग सकता है, लेकिन जरूरी है। व्यवस्था को समझने के लिए, सता की ताकत को जानने के लिए। उसमें आयी विकृतियों की पड़ताल करने के लिए भी। नन्द किशोर शर्मा कभी सेना में थे, बाद में पंजाब नेशनल बैंक में आ गये। नब्बे के दशक में उन्होंने उत्तर प्रदेश प्रशासनिक सेवा की परीक्षा दी। उनका चयन खण्ड विकास अधिकारी के रूप में हुआ। वर्ष १९९४ में हम लोगों की उनसे मुलाकात बड़े नाटकीय तरीके से हुयी। राज्य आंदोलन के दौरान तराई के कई शहरों में हम लोग आंदोलन चला रहे थे। मुरादाबाद जनपद के संभल विकासखण्ड में नन्द किशोर जी की पोस्टिंग थी। संयोग से उस समय पहाड़ के बहुत सारे अधिकारी मुरादाबाद मण्डल में तैनात थे। उनमें से कई अब राज्य के प्रशासनिक महकमे के बड़े ओहदों पर हैं। शर्मा जी एक दिन हम लोगों को ढूंढ़ते-ढांढ़ते अपनी पत्नी के साथ उस ठिकाने पर पहुंच गये जहां हम लोग अविभाजित उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह के ‘हल्ला बोल’ अभियान के प्रतिकार में आंदोलन की रणनीति बनाते थे। वे मुलायम सिंह की उस लिस्ट में शामिल थे, जिन्हें ‘पहाड़ी अफसर’ का तमगा देकर खबर ली जाती थी। खैर, एक मेल-मुलाकात में उनका परिवार हमारे साथ आंदोलन में शामिल हो गया। उनकी पत्नी डॉ. माधुरी शर्मा जिन्हें हम सब लोग दीदी कहकर पुकारते थे, उन्होंने आंदोलन में महिलाओं की बागडोर संभाल ली। चार महीने के अनवरत संघर्ष में वे हमारे साथ खड़ी रहीं। बच्चों और नौकरी की परवाह किये बगैर यह परिवार हमेशा आंदोलनकारियों के साथ खड़ा रहा। उस समय उत्तर प्रदेश में पहाड़ी होने का भारी नुकसान भी उन्हें उठाना पड़ा।
मुरादाबाद मण्डल में रामपुर, चंदौसी, संभल, गजरौला आदि जगहों के प्रवासी आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी करते थे। इस बीच पहाड़ के कई आंदोलनकारी संगठनों के लोग मुरादाबाद में इस आंदोलन को समर्थन देने आते रहे। उत्तराखण्ड के भूतपूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक तब विधायक हुआ करते थे। मुरादाबाद में उस समय संदीप अग्रवाल नगर विधायक थे। उन्होंने ही हमें निशंक से मिलवाया। उन दिनों भाजपा-कांग्रेस से लोगों में भारी गुस्सा था। इसलिए निशंक की सभा कराने में संगठन के लोग सहमत नहीं थे। इस दुविधा को दूर किया शर्मा दंपति ने और सब लोगों ने मिलकर गुरहट्टी की जैन धर्मशाला में उनकी सभा करवायी। लोगों को घर-घर से बुलाकर प्रचारित किया कि निशंक वह राजनीतिक हस्ती हैं, जिन्होंने कर्णप्रयाग से डॉ. शिवानन्द नौटियाल जैसे राजनीतिज्ञ को मात दी। दो अक्टूबर १९९४ को मुजफ्फरनगर काण्ड के बाद आंदोलन ने नई गति पकड़ी। सरकार ने बुआ सिंह को पीटीएस मुरादाबाद का प्रधानाचार्य बनाया। डॉ. माधुरी शर्मा के नेतृत्व में महिलाओं ने कमर में दरांती डालकर प्रशासन को सचेत किया कि यदि बुआ सिंह मुरादाबाद आया तो अंजाम भुगत लेना। इस बीच नन्द किशोर शर्मा का मुरादाबाद केञ् विभिन्न विकासखण्डों में स्थानान्तरण होता रहा। जब भी उनकी बदली का आदेश आता, लोग सडक़ों पर आ जाते। संभल से जब वे सहायक जिला विकास अधिकारी बनकर बुलंदशहर गये तो स्थानीय जनप्रतिनिधियों, उच्च अधिकारियों के अलावा भारी संख्या में आम जनता ने उन्हें विदाई दी। मुरादाबाद के प्रवासी लोगों ने अलग से एक कार्यक्रञ्म आयोजित कर इस परिवार के योगदान के लिए सराहना की।
उत्तर प्रदेश में अपनी सेवा के दौरान उन्हें उच्च अधिकारियों ने हमेशा प्रोत्साहित किया। उत्तराखण्ड से दिली लगाव उन्हें राज्य बनने के बाद यहां खींच लाया। यहां वे जिस जगह भी गये, जनपक्षीय सोच के कारण लोकप्रिय रहे। सरकार ने उनकी सेवाओं को देखते हुए आईएएस की प्रोन्नति के लिए सात बार अपनी संस्तुति दी। विभिन्न जिलों में रहते हुए उच्चाधिकारी हमेशा उनके काम की सराहना करते रहे हैं। शर्मा जी का परिवार कई तरह के सामाजिक कार्यों से जुड़ा है। उनकी पत्नी डॉ. माधुरी शर्मा गरीब और असहाय बच्चों की शिक्षा के लिए काम करती हैं। देहरादून के पास रानीपोखरी में उन्होंने एक शहीद स्मारक की स्थापना की है। उनके पास एक अनाथ लडक़ी रहती है। उत्तराखण्ड के जनसरोकारों से जुड़े इस परिवार को मेरे अलावा और बहुत सारे लोग भी जानते हैं, जिनका किसी न किसी रूप में समाज से रिश्ता रहा है। यह एक संक्षिप्त परिचय है नन्द किशोर शर्मा का। राज्य आंदोलन में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से कई ऐसे लोगों का योगदान रहा है जिन्होंने बेहतर राज्य का सपना देखा था। कई अधिकारी, अपने-अपने क्षेत्रों के विशेषज्ञ, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता आंदोलन और राज्य बनने के बाद उत्तराखण्ड के नवनिर्माण में सहयोग देना चाहते हैं। आंदोलनकारियों को चिन्हित करने से लेकर उन्हें सम्मानित करने की बातें रोज सुनायी देती हैं। सरकार या जनता की नुमाइंदगी करने वालों ने कभी उन लोगों के बारे में जानना नहीं चाहा जो राज्य निर्माण की नींव में लगे हैं। जो लोग आज तिकड़मबाजी से सत्ता के शीर्ष पर पहुंच गये, उन्होंने कभी उन लोगों के अतीत को जानकर सम्मान करना नहीं सीखा जिन्होंने पहाड़ के लिए अपने तमाम हितों की परवाह नहीं की। नन्द किशोर जी के बारे में जानने की किसी को क्या दिलचस्पी हो सकती है। सिर्फ इतनी सी बात है कि उनके परिवार का राज्य आंदोलन के अलावा सामाजिक क्षेत्र में योगदान रहा है। फिलहाल महत्वपूर्ण खबर यह है कि उत्तराखण्ड सरकार में समाज कल्याण महकमे के मंत्री ने अपने साथ दुर्व्यवहार और मारपीट के आरोप में शर्मा जी को सस्पेंड कर दिया है।
CHARU TIWARI JI,
AAPNE BAHUT SAHI BAT AAPNE UTHAI HAI. JO AADMI RAJYA NIRMAN ME YOGDAN KIYA HAI. VAH EK AADERSH PRASTUT KARTA HAI. SHASKIY SEVA KE DORAN U.P.GOVT. ME PRTARNA SHAHA USE AAJ AAPNE RAJYA ,AAPNE GHAR ME SEVA SE NILAMBEN KI SAJA BHUGET RAHE HAI. DUKHAT BAT HAI JO SHRI SHARMA KE SATH HUA VO KISHI SHATH NA HO….