पिछले दिनों अल्मोड़ा जनपद के चौखुटिया में एक विद्यालय के वार्षिकोत्सव में जाना हुआ। राज्य बनने के बाद पहाड़ को देखने के ये वे मौके हैं जो विकास के दर्शन को समझा सकते हैं। चूंकि हमने विकास की जो परिकल्पना की है, उसे हम कुछ सरकारी आयोजनों और एक ढर्रे पर चल रही नीतियों तथा उसके परिणामों की असफलता एवं सफलता के रूप में देखते हैं। लगता है हमने विकास का एक ऐसा खाका तैयार किया है, जिसमें हम उन सब चीजों को फिट कर देना चाहते हैं जो जनोपयोगी हों या न हों। शिक्षा के क्षेत्र में हमने ऐसा खांचा तैयार किया जो हमारी पीढ़ी के लिए न तो व्यावहारिक है और न ही बदलती विश्व व्यवस्था के लिए व्यावहारिक। जब शिक्षण संस्थान इस तरह के आयोजन आयोजित करते हैं तो उसमें शिक्षा की पीड़ा तो झलकती है, लेकिन उसे ठीक करने का हमारा तरीका वही पुराना रहता है। यही कारण है कि बेहतर शिक्षण संस्थान, अच्छा परिवेश और संसाधनों की उपलब्धता के बावजूद उत्तराखण्ड में ऐसी कोई बदलाव की तस्वीर नहीं दिखायी देती जिसे हम पृथक राज्य की अपनी आकांक्षाओं की जीत मान सकें। संतोष की बात यह है कि टुकड़ों में ही सही, कई लोग विकास के इस दर्शन को समझने और लंबे समय से जकड़े पुराने विचार से मुक्त होना चाहते हैं। चौखुटिया के ‘दिशा’ स्कूल ने अपने वार्षिकोत्सव में बदलाव की जिस छटपटाहट को दर्शाया, उससे लगता है कि विकास और हमारे परिवेश के सामंजस्य से हम एक नई पीढ़ी का निर्माण कर सकते हैं।
विद्यालय का यह वार्षिकोत्सव हालांकि उसी परंपरा का निर्वहन है जो प्रत्येक स्कूल और संस्थान अपने सालभर के मूल्यांकन के लिए आयोजित करते हैं, लेकिन यहां बच्चों ने अपने विद्यालय से लेकर विश्व के बदलते समाज, नई चिंतायें, बदलते बाजार और अपने परिवेश को बचाने की जिस चिंता को व्यक्त किया वह बहुत कम देखने को मिलता है। शिक्षा का सामाजिक सरोकारों से दूर हटना और उसे सिर्फ अपने भविष्य के लिए इस्तेमाल करने तक की प्रवृत्ति के खिलाफ यह पूरा आयोजन था। इस कार्यक्रम में बच्चों ने जो प्रस्तुतियां दीं, वह बहुत उम्मीद भरी थीं। शिक्षा और उससे जुड़े लोगों का आम लोगों के सरोकारों से इस तरह का जुड़ाव अब नहीं दिखायी देता। इसमें समस्याओं के प्रति संवेदन और उनके समाधान के लिए नीतियों के निर्माण का आग्रह था। पिछले दिनों पहाड़ में आयी भीषण आपदा और उसके प्रभावों पर छात्रों ने जो ‘जागर’ की प्रस्तुति दी, वह सरकारों के निकम्मेपन और नासमझी को आईना दिखाने वाला था। ‘जागर’ के माध्यम से बच्चों ने पहाड़ के भूगोल, इतिहास, पर्यावरण और विनाशकारी विकास के मॉडल को जिस तरह से प्रस्तुत किया, उससे यह बात पूरी तरह साबित हो गयी कि यह प्राकृतिक नहीं, मानवजनित आपदा थी। पहाड़ में आपदाओं को समझने, उनके प्रभाव और बदलते विकास के मॉडल ने जिस तरह हर वर्ष आने वाली आपदाओं के लिए रास्ता खोला है, उससे इस ‘जागर’ में ‘भगवान’ भी असहाय नजर आये। आपदाओं के सवाल को समझने के लिए सरकार इक्कीस हजार करोड़ के बजाय जनता के उस मर्म को समझे, जिसने बेवजह प्राकृतिक आपदा के नाम पर लोगों को बेघर किया।
असल में इस तरह की चेतना जगाने का काम शिक्षण संस्थान बखूबी कर सकते हैं। दुर्भाग्य से हमारी शिक्षा नीति और शिक्षण संस्थानों में पढ़ाई का जो ढांचा है, उसे सामाजिक कार्यों से बिल्कुल अलग रखकर देखा जाता है। माना जाता है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल बच्चों का कैरियर बनाना है ताकि वे जीवन में कुछ धन प्राप्त कर सकें। इससे कई बार हमारे वो सामाजिक दायित्व पीछे छूट जाते हैं, जो शिक्षा के रास्ते ही ठीक किये जा सकते हैं। यहां ‘दिशा’ स्कूल का जिक्र प्रसंगवश तो है, लेकिन इसके सरोकार बहुत महत्वपूर्ण हैं। इस विद्यालय की स्थापना आज से बारह साल पहले कुछ ऐसे छात्रों को लेकर की गयी थी जो छोटे-बड़े कई अपराधों में संलिप्त रहे। शराब, नशाखोरी और मारपीट के कई मामलों में युवा अभियुक्त भी थे। समाज से उपेक्षित किये गये इन युवाओं को समाज की मुख्यधारा से जोडऩे के लिए क्षेत्र के कुछ पढ़े-लिखे युवाओं ने एक स्कूल खोला। शुरू में इसका काम एक सुधारगृह की तरह रहा। धीरे-धीरे यहां के छात्र यहां से निकलकर सरकारी नौकरियों में भी जाने लगे। जहां सरकार एक तरफ भारी बजट के साथ शिक्षा में आमूल-चूल परिवर्तन का दावा करती है, वहीं समाज के एक बड़े तबके तक शिक्षा अभी तक नहीं पहुंच पायी है। समाज से किसी कारण उपेक्षित लोगों की बात तो छोडिय़े, आज शिक्षण संस्थानों में बुनियादी सुविधाओं के अभाव में शिक्षा स्तरहीन होती जा रही है। ऐसे में सोचना होगा कि हम जिस विकास के लिए संसाधनों का रोना रोते हैं, क्या उसके लिए कोई प्राथमिकता भी तय है। ‘दिशा’ स्कूल के इस वार्षिकोत्सव ने इस बात को भी साबित किया है कि विकास के तमाम नारों के बजाय हमें उन बुनियादी बातों पर ध्यान देना होगा जो समाज के साथ जुड़े हैं।
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