उत्तराखण्ड राज्य का ग्यारहवां स्थापना दिवस, बयालीस शहादतों और चालीस साल के संघर्ष के बाद मिला राज्य। सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर जश्न की तैयारी है, जनता अपने सवालों में उलझी है, वह अपनी आकांक्षाओं का राज्य ढूंढ रही है। उसे अभी अपनी राजधानी नहीं मिली, जंगल पर अपना हक नहीं मिला, पानी पर अधिकार सरकार ने छीन लिया। गांव में सड़क लोगों के आने के लिये नहीं, बल्कि बाहर जाने का रास्ता तैयार कर रही है। हर स्थापना दिवस पर रीति-नीति की बातें करते हुये अब लगता है कि हम भी हर साल अपनी बात रस्म अदायगी के लिये लिखते हैं, अपनी भड़ास मिटाने के लिये। हमारे वैज्ञानिक मित्र डा० मनोज उप्रेती कुमाउंनी कविता के सशक्त शिल्पी हैं, पिछले दिनों उनके दो कविता संग्रह प्रकाशित हुये, उनकी एक कुमाउंनी कविता ’खुलि आखोंक स्वैंण’ (खुली आंखों के सपने) हमारी बात कहती प्रतीत होती है, इस कविता का हिन्दी भाव प्रस्तुत है-
बोलना-चालना,
कविता-कहानी करना,
लड़्ना-भिड़ना, चिल्लाना,
गप्प-शप्प मारना,
आवाज लगाना, याद रखना!
उदघोष मत करना,
आह्वान मत करना,
इकट्ठा मत होना, एक साथ,
आवाज लूट ली जायेगी,
जुबान काट दी जायेगी, ![]()
उस किसी बात को मत सुनना,
जिसमें खिलाफत हो,
नहीं तो कान नोंच दिये जायेंगे,
डाल दिया जायेगा गरम तेल!
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थाली बजाना,
हुड़्का बजाना,
ढोलक बजाना,
दमुआ-नागर भी बजाना,
नाचना-कूदना,
छलिया-छोलिया स्वांग करना,
खबरदार!
मत बजाना रणसिंह, न तुतुरी,
कहीं हक-हकूक के लिये,
बंद कर दिये जायेंगे साज-बाज,
कलम कर दिये जायेंगे हाथ-पांव।
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गीत गाना, फाग गाना,
शकुनाखर गाना, झोड़ा गाना,
न्योली गाना, जोड़ मारना,
पर………
केवल भाटों की तरह।
ऐसे मत गाना,
जिससे लोगों की नींद खुल जाये,
कोई भी जाग सकता है,
जो तुम्हारी नींद-चैन छीन ले।
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बाघ देखना, घुरड़ देखना,
कीड़े-मकौडे़ देखना,
गाय-भैंस, बकरी पालना,
लेकिन…….
बाघ बनने की मत सोचना,
कीड़े-मकौड़े हो, वैसे ही रहना,
नहीं तो कुचल दिये जाओगे,
पांवों के बूट तले,
बन्दूकों की बटों तले।
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क्यों!
बोलना चाहते हो,
गाना चाहते हो,
नाचना चाहते हो,
बजाना चाहते हो,
शेर बनना चाहते हो,
सपना देखते हो,
खुली आंखों से?
या
नींद में ही हो,
या
सोये हो, जो,
पानी में आग लगा रहे हो।
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चेतना थी, चेतना है,
फिर उठो, दे दो आवाज,
इस पहाड़ से, उस पहाड़ तक,
इकट्ठा हो, खड़े हो जाओ,
उठा लो नगाड़े-निशाण,
उनके लिये,
जो छीन रहे हैं हमारा हक,
जो दे रहे हैं, हमेशा धोखा,
उनकी नींद,
उनका चैन,
भूख-प्यास,
उड़ा दो, बता दो,
नींद टूट गई है हमारी,
हम उठ गये हैं,
तब देखना,
कैसा सुराज आयेगा।
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अरेऽऽऽऽऽ ये तो मेरी कविता है, मेरा मर्म है, मेरा दर्द है।