इस वर्ष राज्य में दो बड़ी बातें हुई, पहला हरिद्वार में सदी का महाकुम्भ और दूसरा दो महीने तक आपदा से मची तबाही। दोनों में राज्य सरकार और उसके मुखिया ने प्रबंधन के पुराने रिकार्ड तोड़ दिये, बताया गया कि पहले कभी ऐसा कुंभ न किसी ने देखा और न हुआ। एक साथ करोड़ों लोगों ने डुबकी लगाई, अमेरिका के एक बड़े प्रबंधन संस्थान के प्रमुख ने मुख्यमंत्री से कहा कि ऐसे प्रबंधन के लिये कुंभ को नोबल पुरस्कार मिलना चाहिये। मुख्यमंत्री के कुशल प्रबन्धन में कई मौतें और करोड़ों के वारे-न्यारे कर कुंभ निपट गया। पिछले दिनों आयी आपदा ने प्रदेश में भारी तबाही मचायी, सुमगढ़ के अलावा राज्य में 172 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। करोड़ों की सम्पत्ति मलबे में दब गई, हजारों लोग बेघर हो गये। दो महीने बाद भी सरकार के पास ऐसा कोई तंत्र नहीं है, जो बता सके कि प्रभावितों की संख्या कितनी है। अभी तक लोगों के पास रसोई गैस, खाने के सामान और पहनने के लिये कपड़ों की दिक्कत है। बावजूद इसके राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने राज्य के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को इस बात के लिये बधाई दी है कि उन्होंने सौ साल में आई ऐसी आपदा को चौबीस घण्टे में निपटा दिया, ऐसा प्रबन्धन इससे पहले उन्होंने नहीं देखा।
कुंभ और आपदा पर मुख्यमंत्री के प्रबन्धन के लिये दो बड़े लोगों की सिफारिशें अलग-अलग अखबारों के परिशिष्टों से मिली। पिछले दिनों एक दैनिक समाचार पत्र ने अपने फोकस स्तम्भ में आपदा पर मुख्यमंत्री की सहृदयता और उनकी संवेदनाओं को जिस तरह से उकेरा है, उससे दानवीर कर्ण और पुराने दानी राजा भी शरमा जांयें। फिलहाल पेड न्यूज का विरोध करते-करते मीडिया कब संवेदनाओं का सौदागर बन गया, पता ही नहीं चला। यह किसी मुख्यमंत्री के यशोगान का कोई परिशिष्ट होता तो कोई बात नहीं थीं। सबसे बड़ी चिन्ता का विषय यह है कि लोगों की तकलीफों का सौदा करना खतरनाक संकेत है। उत्तराखण्ड में आपदायें नई बात नहीं है, इस बार एक साथ भूस्खलन की सैकड़ों घटनायें हुई, साढ़े तीन हजार से अधिक गांव ऐसे हैं, जिनमें रहने वाले लोग भारी दहशत में जीने को मजबूर रहे। उत्तराखण्ड देश का पहला राज्य है, जिसके पास अपना आपदा प्रबन्धन मंत्रायक और विभाग है। सुमगढ़ के ठीक एक महीने बाद अल्मोड़ा जनपद के चार गांवों में आपदा ने चार दर्जन लोगों को लील लिया। देखते-देखते भूस्खलन और बिजली गिरने की घटनाओं ने राज्य के एक बड़े हिस्से को अपनी चपेट में ले लिया, जगह-जह टूटे मकान और सड़कों ने राज्य के आपदा प्रबन्धन की पोल खोलकर रख दी। आपदा के दो महीने बीत जाने के बाद भी दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार राहत नहीं पहुंचा पाई है। गांवों में प्रभावित परिवारों का अभी तक सर्वे नहीं हो पाया है, सबसे ज्यादा प्रभावित अल्मोड़ा जनपद के मानवहानि वाले गांवों को छोड़ दिया जाये तो अभी तक लोगों को मुआवजा तो मिलना दूर, उनके नाम भी तय नहीं हो पायें हैं। उन्हें पटवारी और तहसील के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। अल्मोड़ा के निकट कफून गांव में कई हरिजन परिवारों के मकान या तो ध्वस्त हो गये थे या उनमें दरारें आ गई थीं, ग्यारह मवेशी दब गये थे। प्रशासन आपदा के एक महीने तक इनको निकालने की व्यवस्था नहीं कर पाया। टिहरी जनपद के जाखणीधार विकासखण्ड के चौंरियाधार गांव में चार घर जमीन में समा गये, सरकार अभी इनके नुकसान का आकलन ही कर रही है, इन्हें खाने-रहने के लिये सरकार की ओर से मात्र १००० रु० मिले। गांवों में प्रभावित परिवारों को अभी भी भोजन, आवास और चिकित्सा की जरुरत है। हालांकि कई स्वयंसेवी संगठनों ने गांवों में जाकर उनकी मदद की है, कुल मिलाकर सरकार अपने तरीके से काम कर रही है। धीरे-धीरे राहत का काम भी सिमट रहा है, सरकार असल में अपनी संपत्ति के नुकसान का आकलन करती है। सड़कें, अस्पताल, स्कूल, पंचायत घर और सरकारी संपत्ति के नुकसान का मुआवजा मांगती है। इसके लिये वह 21 हजार करोड़ की मांग भी कर चुकी है, जनता के हिस्से में सिर्फ आश्वासन और हवाई बयानबाजी है।
एक तरफ पहाड़ के लोगों को आपदा से उबरने और अपने घरों को बनाने की जद्दोजहद है तो दूसरी ओर प्रदेश के मुखिया की मुस्कुराती तस्वीर उन्हें आपदा में मसीहा घोषित करने में लगी है। एक समाचार पत्र के पूरे पृष्ठ में रमेश पोखरियाल निशंक की संवेदनाओं, उनके कवि हृदय व्यक्तित्व और एक दिन में सात जिलों के भ्रमण का जिक्र है। इसमें छपी सामग्री बताती है कि राष्ट्रपति भी मुख्यमंत्री के प्रबन्धन से प्रभावित हैं। उन्होंने इतनी बड़ी आपदा को निपटाने के लिये मुख्यमंत्री को बधाई दी है। अखबार ने लिखा है कि मुख्यमंत्री जी गांव में जाकर कई लोगों की उखड़ती सांसों को लौटा लाये। गांवों को देखकर निशंक की आंखों के नम होने से लेकर वे तमाम बातें हैं, जो आने वाले दिनों में निशंक को कोई पुरस्कार दिलवाने में मददगार साबित हो सकती है। उम्मीद करें कि महाकुंभ में न सही, आपदा से ही मुख्यमंत्री कोई पुरस्कार हासिल कर लें। इससे क्या फर्क पड़ता है कि वह महाकुंभ से मिला है या आपदा से, आखिर सत्ता भी तो एक पुरस्कार ही है।
चारू जी क्या बात कही है कुछ बचा ही नहीं जो जोड़ा जा सके