उत्तराखण्ड में उत्तरायणी का मेला धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से जितना महत्वपूर्ण है उससे ज्यादा यह नई चेतना और नये संकल्पों के साथ आगे बढने का पड़ाव है। सदियों से इस मेले से कई लोकोक्तियों और लोककथाओं की रचना हुयी। ये इस संदर्भ में ज्यादा महत्वपूर्ण और सार्थक हैं कि सरयू और गोमती के संगम से जल से संकल्प लेकर हमने आंदोलन के कई पड़ावों को देखा और प्रतिकार की धार को पैना किया है। कहा जाता है कि खांणि नि खांणी बागस्यर देखियाल। इसका अर्थ है कि खाने और न खाने वाले लोग बागेश्वर में देखेंगे। इस लोकोक्ति ने उस समय भी छुआछूत के खिलाफ आवाज उठाने के लिये बागेश्वर को ही चुना। पहले उत्तरायणी मेले को जब सांस्कृतिक रूप से मनाने की पंरपरा थी तो तब भी इसमें सामाजिक सरोकारों की व्यापक दृष्टि समाहित थी। रात-रात भर जागरण कर लोग गांवों में अपनी समस्याओं और उसके समाधान के रास्ते तलाशते रहे हैं। आजादी की लड़ाई के शुरुआती दौर में बागेश्वर से आजादी के स्वर मुखर होने शुरू हो गये थे। वर्ष 1921 में कुली बेगार के खिलाफ निर्णायक लड़ाई के लिये उर्जा भी बागेश्वर के बगड़ से मिली। यह एक दिन या एक स्वर की ताकत नहीं, बल्कि वर्षों से पनप रहे असंतोष की परिणति थी। इसका बागेश्वर में फूटना इस दृष्टि से भी ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण था कि बाद की पीढ़ियों ने इससे सबक लिये, चेतना समेटी, आंदोलनों की अगुआई करना सीखा। इतना ही नहीं मुद्दों को शक्ल देने के लिये से प्रेरणा की जमीन के रूप में भी अपना आदर्श माना। यह हमारी सांस्कृतिक चेतना से उसी तरह आत्मसात हो गये जैसे सरयू और गोमती का संगम। यही संगम उत्तराखंड के जनसरोकारों से जूझने वाले लोगों को बल देने वाला है। इस बार भी सब लोग जुटेंगे। राज्य बनने के बाद नये संकल्प लेने वालों का इंतजार संगम को है। पिछले कई दशकों से बगड़ में चेतना की हुंकार नहीं सुनाई दी।
बागेश्वर कई आंदोलनों का गवाह रहा है। 1916 में कुमांऊ परिषद की स्थापना के बाद लगातार आजादी के आंदोलन के स्वर इस जमीन से उठते रहे। बोरगांव का चरखा वर्धा तक गया। चामी गांव ने आजादी के दीवानों को संरक्षण देने के साथ इस अलख को गांव-गांव तक पहुंचाने का काम किया। स्वरोजगार के लिये ग्रामीणों में चेतना और खादी को बढ़ावा देने का काम किया। बागेश्वर में कुली उतार आंदोलन ने महिलाओं को चूल्हे-चौके से बाहर निकालकर चेतना का नया आकाश दिया। 1929 में गांधीजी के बागेश्वर आने पर उनकी मुलाकात वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली से हुयी। इसी बागेश्वर में उन्होंने गांधी टोपी पहनी। 1930 में पेशावर में उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम एकता का इतिहास रच दिया। आजादी के प्रमुख स्तभों में रहे बद्रीदत्त पांडे, हरगोबिन्द पंत, विक्टर मोहन जोशी, श्यामलाल गंगोला, मोहन सिंह मेहता, बिश्नी देबी साह, कुंती देवी, तुलसी देवी के अलावा उत्तराखंड में आजादी को नये स्वर देने वालों की यह जमीन रही है। आजादी के बाद भी यहां चेतना के नये स्वर उभरते रहे हैं। उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन, नशा नहीं रोजगार दो, वन बचाओ, वन संरक्षण के खिलाफ आंदोलन और भ्रष्टाचार के प्रतीक कनकटे बैल ने भी इसी भूमि से अपनी हुंकार भरी। आंदोलन के कई पड़ाव इस जमीन ने देखे हैं। उम्मीद की जानी चाहिये कि यह जमीन फिर पहाड़ के पुनर्निमाण के लिये गोमती-सरयू संगम से कोई संकल्प लेगी।
बागेश्वर में उत्तरायणी मेले के साथ ही कुंभ मेले की तैयारी चल रही है। इसी दिन से कुंभ मेला भी शुरू होगा। सरकार की ओर से सबका स्वागत किया जा रहा है। विज्ञापनों में बताया जा रहा है कि देवभूमि में आपका स्वागत है। भारी संख्या में पुलिस बल की व्यवस्था की जा रही है। पड़ोसी राज्यों से भी पुलिस मंगाई जा रही है। सरकार के दावों की पोल प्रदेश में अपराधें ने खोल दी है। कालाढूंगी और रामनगर कांडों के खून के धब्बे अभी सूखे भी नहीं थे कि हल्द्वानी में एक स्कूली छात्रा अपहरण कर हत्या कर दी गयी। हल्द्वानी में ही एक नर्सिग होम में इलाज के लिये आयी महिला के साथ बलात्कार का मामला सामने आया है। ऋषिकेश में चलती कार में एक लड़की के साथ बलात्कार हुआ। बागेश्वर जनपद के गरुड विकास खंण्ड के पूर्व प्रमुख चतुर सिंह परिहार की हत्या ने सबको सन्न कर दिया। ये सब अपराध् सिपर्फ दस दिन के अन्दर हुये हैं। इनके अलावा अपेक्षाकृत शांत माने जाने वाले पहाड़ में लगातार अपराधों का ग्रापफ बढ़ रहा है। मुख्यमंत्री और उनकी सरकार शब्दों की लफ्फाजी से इन्हें सामान्य मान रही है। जिस हरिद्वार में गंगा स्नान कर लोग अपने को धन्य समझते थे उसमें डुबकी लगाने की इजाजत भी अब टिहरी हाइडो प्रोजेक्ट देगा। सरकार इस बात पर खुश है कि टिहरी से लोगों के लिये पानी छोड़ने की मांग परियोजना के कर्ताधर्ताओं ने मान ली है। गंगा में स्नान के अलावा अपनी परिजनों की अन्तेष्टि के लिये घाटों पर पानी छोड़ने के लिये ग्रामीणों को अनुमति लेनी पड़ती है। अब बागेश्वर के सरयू-गोमती की बारी है। यहां सरयू पर बन रहे बांध् ने इस बात के संकेत दे दिये हैं कि जिस सरयू को तुम अपना अराध्य मानते हो वह अब एक निजी कंपनी की मल्कियत होने जा रही है। पहाड़ में जिन नदियों से हम आप संकल्प लेते रहें हैं उन्हें निजी हाथों को या तो बेच दिया है या बेचने की तैयारी है। गढ़वाल में सारी नदियों को जेपी और थापर के हवाले करने के बाद लुटेरे अब बची हुयी नदियों पर नजरें गढ़ायें हैं।
बढ़ते अपराध् और लुटती नदियों का भारी अर्न्तसंबंध् है। संसाधनों पर लूट और राजनीतिक संरक्षण से इन्होंने पहाड़ चढ़ना शुरू किया है। जीवनदायनी नदियां और हमारी चेतना की प्रतीक नदियां अब माफिया के हाथों में जा रही हैं। इसी रास्ते अपराध आ रहे हैं। इन्हें पूरी तरह हमारी नासमझ सरकारें पोषित कर रही हैं। राज्य बनने के बाद का यह पहा दशक है जिसमें उत्तराखण्ड के लोगों ने कोई प्रतिकार नहीं किया है। इससे पहले उत्तराखण्ड में बीस-तीस का दशक आजादी के लिये एकजुट होने का, चालीस का दशक भारत छोड़ों आंदोलन और टिहरी रियासत के खिलाफ लड़ने का, पचास-साठ का दशक हिमालय की हिफाजत के लिये, सत्तर का दशक युवा चेतना और वनों को बचाने का, अस्सी का और नब्बे का दशक राज्य आंदोलन का रहा है। अब राज्य बन गया है। जो लोग इन लड़ाइयों और चेतना में साथ नहीं थे वे बारी-बारी यहां के नीति नियंता बन बैठे। सरयू-गोमती के संगम से इस बार नई चेतना के स्वर उभरें। एक नई ताकत के साथ अपनी धरोहरों को बचाने के लिये एक ओर कुली बेगार आंदोलन चलाने की उम्मीद की जानी चाहिये।
फोटो- साभार मेरा पहाड़ फोरम


ऐसा लगता है कि उत्तराखण्ड के जनआन्दोलनों का दशक के चौथे साल से कुछ लगाव सा है। 1974, 1984. 1994 में बड़े और पूरे प्रदेश व्यापी आन्दोलन हुये। 2004 में भी कुछेक आन्दोलन हुये ही। मुझे 2014 का इंतजार है, जब उत्तराखण्ड में भष्ट्राचार उन्मूलन, स्थाई राजधानी और नवनिर्माण के लिये एक और जन आन्दोलन होगा। लेकिन यह पहला मौका होगा, जब जनता अपने द्वारा निर्वाचित सरकार से लड़ाई लड़ेगी।