प्रवास में रहने वाले युवाओं की संस्था है ‘क्रिएटिव उत्तराखण्ड’ म्यर पहाड़’, उनका एक अभियान है ‘हिमालय बचाओ, हिमालय बसाओ।’ इसी के तहत वे वर्षभर उत्तराखण्ड के विभिन्न हिस्सों में कार्यक्रम आयोजित करते हैं। इनमें मुख्य रूप से इतिहास और संस्कृति बोध को महत्व दिया जाता है। पहाड़ के महापुरुषों, आंदोलनों और यहां के पुराने और मौजूदा सवालों को समझने के लिए साल भर में तय कार्यक्रम हैं। इसके अलावा कई और कार्यक्रम भी इस अभियान में जुड़ते रहे हैं। हिमालय बसाने का नारा देने वाले उत्तराखण्ड राज्य के शिल्पी और देश के विभिन्न आंदोलनों में मुख्य भूमिका निभाने वाले स्वर्गीय ऋषिबल्लभ सुंदरियाल की पुण्यतिथि उनके गांव मझगांव (चौबट्टाखाल, पौड़ी) में हर वर्ष एक जुलाई को मनायी जाती है। बड़ी संख्या में लोग इसमें शामिल होते हैं। इस बार मुख्य रूप से इसमें शामिल होने के लिए उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री मेजर जनरल भुवन चंद्र खण्डूड़ी आये। उनके आने की जो शर्त थी, उसे हम लोग पूरा नहीं कर पाये। जिस समय हम लोग आयोजन स्थल पर पहुंचे, खण्डूड़ी जी अपना वक्तव्य पूरा कर रहे थे। हमें बड़ी शर्मिंदगी महसूस हुई, क्योंकि इस कार्यक्रम का आयोजन हमने ही किया था। खण्डूड़ी जी को आश्वस्त किया गया था कि कार्यक्रम ठीक दस बजे शुरू कर दिया जायेगा। वे कार्यक्रम स्थल पर पौने दस बजे ही पहुंच गये। जब पता लगा कि वे मंच में अकेले बैठ गये हैं, तो हडक़ंप मचा और लोग आये। खण्डूड़ी जी ने स्वयं ही कार्यक्रम शुरू कर दिया। हम पहुंचे तो आने के लिए हमारा भी धन्यवाद कर गये। अब हम सबकी समझ में आ गया कि वे राज्य के मुखिया के रूप में क्यों फिट नहीं बैठते हैं। इसी बहाने हम जैसे लोगों को भी सबक मिल गया, जो सार्वजनिक जीवन में शुचिता का ढोल पीटते रहते हैं। खैर, इस कार्यक्रम में खण्डूड़ी जी की बात प्रसंगवश है। उनको आमंत्रित करने का मतलब एक पूर्व मुख्यमंत्री के आने से इस कार्यक्रम का महत्व बढ़ाने का नहीं था। हम लोग कई बार सिक्के का एक ही पहलू देखते हैं। असल में ऋषिबल्लभ सुंदरियाल को याद करते हुए हम लोग एक पूरी परम्परा को भी याद करना चाहते हैं। जिसमें कई ऐसे लोगों के परिवार शामिल रहे हैं जिन्हें हम मूल संदर्भों में याद नहीं करते हैं। वर्ष १९७२ में जब गढ़वाल विश्वविद्यालय आंदोलन चला, तो सुंदरियाल जी के साथ जेल जाने वालों में खण्डूड़ी जी की माता जी भी प्रमुख थीं। उस समय उनके मामा हेमवतीनन्दन बहुगुणा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। जब बहुगुणा जी को पता चला कि उनकी बहिन भी जेल में है तो उन्होंने जिलाधिकारी से उनका हालचाल पूछने को कहा। जिलाधिकारी भागे-भागे जेल गये। बहुगुणा जी की बहिन ने जिलाधिकारी से कहा कि अपने मुख्यमंत्री से कहें कि मेरी चिंता न करें भैजी। आप अपना काम करें, मेरे और भी बहुत भैजी हैं, जो समाज निर्माण में लगे हैं। खण्डूड़ी जी के परिवार का भी अपने क्षेत्र में शिक्षा और सामाजिक कार्यों में बड़ा योगदान रहा है। इसलिए ऋषिबल्लभ सुंदरियाल की पुण्यतिथि में उनके आने का अलग मतलब था।
संयोग से चौबट्टाखाल के लिए हमें धूमाकोट से होकर जाना पड़ा। यह खण्डूड़ी जी का चुनाव क्षेत्र है। ऋषिबल्लभ सुंदरियाल जी को युगपुरुष मानने वाले विपिन त्रिपाठी के सुपुत्र और द्वाराहाट के विधायक पुष्पेश त्रिपाठी को रामनगर से अपने साथ लेना था। दूरदर्शन के पूर्व समाचार संपादक राजेंद्र धस्माना भी साथ में थे। खण्डूड़ी जी के क्षेत्र में हमारा स्वागत टूटी सडक़ों से हुआ। मुख्य रास्ता छोडक़र गौलेखाल होते हुए जंगलात की सडक़ से गये और रास्ता भटककर रात को धूमाकोट पहुंचे। मजबूरन रात को वहीं रहना पड़ा। पूर्व मुख्यमंत्री का चुनाव क्षेत्र होने के अलावा यह सतपाल महाराज की कर्मस्थली भी है। आगे जाकर उनकी पत्नी अमृता रावत का चुनाव क्षेत्र बीरोंखाल पड़ता है। धीरेंद्र प्रताप और लेफ्टिनेंट जनरल टीपीएस रावत का घर भी यहीं है। सतपाल महाराज को रेलपुरुष बताने वाले पोस्टरों से पूरा क्षेत्र पटा है। पोस्टरों में पहाड़ में रेल भी है और भाषाई आंदोलन में सतपाल महाराज शिखर पुरुष भी। मगर हकीकत यह है कि इन सभी नेताओं से लोगों को भारी नाराजगी है। बातचीत में लोग बताते हैं कि खण्डूड़ी, सतपाल या अन्य किसी नेता ने ऐसा कोई काम नहीं किया, जिसे याद किया जा सके। लोगों की कई समस्यायें हैं। पिछली आपदा का पैसा अभी तक नहीं मिला है, सडक़ें और पेयजल योजनायें फिर से ध्वस्त हो गयी हैं। रामनगर से चौबट्टाखाल तक सडक़ से लेकर विकास के दावों की विज्ञापनी तस्वीर के अलावा सबकुछ निराशाजनक है। चौबट्टाखाल से सतपुली उतरने के लिए एक सडक़ है। इसे ‘श्रमशक्ति मार्ग’ के नाम से जाना जाता है। आजादी के तुरंत बाद १९९२ में लोगों ने यह सडक़ श्रमदान से तैयार की थी। सतपुली से इस सडक़ की लंबाई ५२ किलोमीटर है। इसका सर्वे भी स्थानीय लोगों ने किया। १९५८ में तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविन्द बल्लभ पंत ने इसका उद्घाटन किया। ‘श्रमशक्ति मार्ग’ उत्तराखण्ड के विकास और उसमें जनता की भागीदारी का एक नायाब नमूना है। ग्रामीणों ने सरकार को बताया कि सहकारिता और सही समझ से बहुत कम लागत में भी स्थायी निर्माण किया जा सकता है। जहां धूमाकोट में आधुनिक तकनीक से बनायी गयी सडक़ दर्जनों जगहों से टूटती है, वहीं ‘श्रमशक्ति मार्ग’ का आपदा के समय भी एक पत्थर नहीं हिलता। चौबट्टाखाल से सतपुली आने तक यह समझने में देर नहीं लगी कि हम अकेले कितने ईमानदार और कर्मठ हों, जब तक इसे संगठनात्मक रूञ्प से आगे नहीं बढ़ायेंगे, चीजें आगे नहीं बढ़ेंगी। खण्डूड़ी जी समय के पाबंद हैं, ईमानदार हैं, अच्छा करना चाहते हैं। इस पर किसी को असहमति नहीं हो सकती, लेकिन यह भी सत्य है कि वे श्रमशक्ति मार्ग का निर्माण करने वाले शिल्पी नहीं हो सकते। रास्ता धूमाकोट से नहीं, श्रमशक्ति मार्ग से निकालिये।

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