आज से तीन-साढ़े तीन दशक पहले पहाड़ ऐसे नहीं थे, जैसे अब हैं। अब पहाड़ बहुत बदल चुके हैं, रुप-रंग और परिवेश ही नहीं बदला है, भूगोल भी बदल गया है। सोचने का दायरा भी बदल गया है, रहन-सहन भी बदल गया है, छोटी-छोटी जगहों ने बाजार का रुप ले लिया है। हर जरुरत की चीजें इन बाजारों में उपलब्ध हैं, मेरे गांव से आठ किलोमीटर दूर एक कस्बा है कफड़ा, यह हमारे क्षेत्र का बहुत पुराना बाजार है। यहां पर सभी जरुरत की चीजें मिला करतीं थीं, हमारी सरकारी राशन की दुकान भी कफड़ा के पास सुनौली में ही थी। जिस मकान में यह दुकान चलती थी, वह इस इलाके का पहला लेंटर वाला मकान था। इस मकान के मालिक का परिचय भी हमारे लिये राम सिंह लेंटर के मकान वाले के रुप में ही था। हम बहुत बाद तक भी हम उन्हें इसी रुप में जानते रहे। रानीखेत से बद्रीनाथ को जाने वाली घोड़िया सड़क (जिला पंचायत की सड़क) यहीं से निकलती थी, शायद इसलिये भी यह जगह जल्दी ही एक बड़े बाजार का रुप ले पाई हो। आजादी के तरन्त बाद बद्रीनाथ वाली सड़क बन गई तो कफड़ा का महत्व और बढ़ गया। लेकिन कफड़ा और राम सिंह जी का महत्व केवल पुराने बाजार और लेंटर वाले मकान का ही नहीं था। इन दोनों का व्यापक मतलब और सरोकार थे, जिन्हें हमने बहुत बाद में जाना।
राम सिंह जी आजादी के आन्दोलन के बहुत बड़े योद्धा थे, अंग्रेजों ने उन्हें जिन्दा या मुर्दा पकड़ने पर 500 रुपये का ईनाम रखा था। आजादी के बाद भी क्षेत्र के विकास में इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। नौगांव इण्टर कालेज के वे संस्थापक प्रबंधक रहे, जो इस क्षेत्र में शिक्षा के महत्वपूर्ण संस्थानों में एक रहा। इस विद्यालय के संस्थापक स्व० श्री लक्ष्मीदत्त कबड़वाल जी ने इस विद्यालय को बड़ी मेहनत से सींचा। कफड़ा बाजार, जहां से चीनी लेकर हमें फिर नौगांव की दो किलोमीटार खड़ी चढ़ाई चढ़कर ऐराड़ी होते हुये अपने गांव मनेला जाना होता था। उसकी तलहटी में एक मैदान था, इसमें हम अपने से बड़े बच्चों को खेलते देखते थे, थोड़ा सुस्ता लेते थे और खेल भी देखते थे। इस मैदान के बारे में हमें इतना ही पता था कि वन विभाग ने वनीकरण के लिये इसे नर्सरी के रुप में इस्तेमाल किया है। वन विभाग का छोटा सा भवन भी इसमें था, चारों तरफ हरे-भरे पेड़ों से आच्छादित रहता था यह मैदान। विस्तृत जानकारी बाद में मिली कि यह एक ऐतिहासिक मैदान है, यहां 1939 में बिमलानगर सम्मेलन के नाम से समाजवादियों का बड़ा सम्मेलन हुआ था, जिसमें देश की प्रमुख समाजवादी हस्तियों ने भागीदारी की थी। बाद में हमारी पीढ़ी के कई साथियों ने मिलकर इसे आमजन से परिचित कराने की कोशिश की।
कफड़ा की एक और विशेषता थी, यहां से सबसे पुराने दुकानदारों में से एक थे बीरबल जी। उनकी ताकत की कहानी हमने बहुत सुनी थी। वे दो-दो बोरी गेहूं गाड़ी में से एक साथ उतार देते थे, बहुत बड़ी कपड़े की दुकान भी उनकी थी, पूरे इलाके के लोग उनसे खाने-पीने के सामान के साथ कपड़ा भी खरीदकर ले जाते थे। उन्हें हर किसी का सामान और कीमत मुंहजुबानी याद रहता था। उनका बीरबल जी पढ़े-लिखे नहीं थे, उनकी ज्यादातर दुकानदारी उधारी की थी, सेना और बाहर नौकरी करने वालों के बच्चे उनके यहां से सामान ले जाते और मनीआर्डर आने पर छह महीने-साल भर में पैसा चुकाते थे। यह हिसाब कहीं लिखा नहीं होता था, उनका मानवीय पक्ष कितना मजबूत था इसे उन पर बने एक किस्से से समझा जा सकता है। एक बार एक महिला उनकी दुकान में सामान लेने आई और उसने कपड़े का एक थान चुपके से चोरी कर अपनी डलिया में डाल लिया। इसे बीरबल जी ने देख लिया, दुकान में काफी भीड़ होने के कारण उन्होंने उसे नहीं टोका, लेकिन जब वह कफड़ा बाजार से बाहर निकल गई तो बीरबल जी उसके पास गये और कहा कि “बेटा गलती से एक थान तुम्हारी डलिया में आ गया है।” इस पर उस महिला को बहुत झेंप हुई, लेकिन बीरबल जी ने इस प्रसंग को कभी भी किसी को नहीं बतलाया।
इस प्रसंगों का जिक्र बदलते पहाड़ को समझने के लिये जरुरी है, विशेषकर हमारी चेतना, इतिहास और संस्कृतिबोध के संदर्भ में। राम सिंह जी को लोग आज उस तरह याद नहीं करते, जिसके कि वह हकदार थे, नौगांव विद्यालय में स्व० कबड़वाल जी का एक चित्र तक नहीं लगा है। नई पीढ़ी को बिमलानगर सम्मेलन के बारे में जानने की कोई रुचि नहीं है, कफड़ा का बाजार अब सिर्फ कंट्रोल की दुकान वाला नहीं है, बल्कि मोबाइल से लेकर चाऊमीन और बर्गर से पटा बाजार है। अब कोई बीरबल की दुकान लोगों का ठिकाना नहीं रह गई है, अब अपने इलाके के लोगों का पहचानने में किसी की कोई रुचि नहीं है। बहुत सारी कारों के मालिक हैं यहां, नई पीढ़ी के लोग अब अलग-अलग दलों के नेता अपने आकाओं के स्थानीय प्रवक्ता है। उनके लिये चेतना का मतलब बाजार के हिसाब से अपने का ढालना है, यह कफड़ा ही नहीं पूरे उत्तराखण्ड की स्थिति है। श्रीदेव सुमन की टिहरी से लेकर ऋषिबल्लभ सुन्दरियाल के चौबट्टाखाल तक, वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली के दूधातोली से लेकर राम सिंह धौनी के सालम तक, आजादी की लड़ाई से लेकर आपातकाल तक, चिपको से लेकर राज्य आन्दोलन तक की एक बडी जमात के सपने और बेहतर समाज को बनाने के संघर्ष को बाजार इतनी जल्दी लील जायेगा सोचा भी नहीं था।
ठेकेदारी और जल्दी पैसा और नाम कमाने वाली राजनैतिक प्रवृत्ति ने यहां एक पीढी़ के सोचने-समझने की शक्ति को समाप्त कर दिया है। हमारे लिये नये कल का सपना देखने वाले राम सिंह, शिक्षा की अलख जगाने वाले लक्ष्मीदत्त कबड़वाल और समाज को अभाव में भी संबल देने वाले बीरबल सिंह की क्या हमें अब जरुरत नहीं है?
यक्ष प्रश्न उपस्थित किया है, आपने। उत्तर देने में भी हिचकिचाहट हो रही है, क्योंकि इन बदलावों के जिम्मेदार भी हम ही कहीं न कहीं हैं। अगर कोई राजनेता हमें चुनावों में शराब पिलाता है और नोट बांटता है तो हम भी उतने ही जिम्मेदार हो जाते हैं, जितना कि बांटने वाला और हम उससे यह खैरात लेकर, उसके हाथों में बिककर उसे और भ्रष्टाचार के लिये उकसाते है।